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18 साल से आमेलन का इंतजार! परिवार से दूर: UPPCL के बाबुओं की दर्दभरी पुकार, नए अध्यक्ष से न्याय की उम्मीद

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🚨 UPPCL MEDIA की विशेष रिपोर्ट

# 18 साल से परिवार से दूर, आमेलन पर ताला! आखिर बाबुओं के दर्द पर कब पिघलेगा पावर कॉरपोरेशन का दिल?

## अधिकारी बदलते रहे, सरकारें आती-जाती रहीं, नीतियां बनती रहीं—लेकिन घर लौटने की आस में बैठे बिजली विभाग के कर्मचारियों की जिंदगी का इंतजार खत्म क्यों नहीं हुआ?

### नए अध्यक्ष से नई उम्मीदें, नया जोश और एक ही सवाल—क्या अब मिलेगा पीड़ित बाबुओं को न्याय, या फाइलों में ही दम तोड़ देगी परिवारों की पुकार?

लखनऊ। सरकारी नौकरी पाने का सपना हर युवा इसलिए देखता है कि वह अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सके, बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बन सके, बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके और अपने जीवनसाथी के साथ एक सामान्य पारिवारिक जीवन जी सके। लेकिन उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के अनेक कर्मचारियों के लिए यही सपना एक ऐसी पीड़ा में बदल गया है, जिसका अंत उन्हें वर्षों बाद भी दिखाई नहीं दे रहा।

जिस नौकरी को परिवार की खुशहाली का आधार बनना था, वही नौकरी अनेक कर्मचारियों के लिए अपनों से दूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ और अनिश्चित इंतजार की वजह बन गई है। कर्मचारी दफ्तर में फाइलें संभाल रहे हैं, विभागीय कामकाज चला रहे हैं और बिजली व्यवस्था की प्रशासनिक मशीनरी को गति दे रहे हैं; लेकिन उनके अपने घरों में कोई बुजुर्ग बीमारी से जूझ रहा है, कहीं बच्चों की पढ़ाई का सवाल है, तो कहीं पति-पत्नी अलग-अलग शहरों में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग की सेवा करने वाले इन कर्मचारियों की अपनी जिंदगी और परिवार की कोई अहमियत नहीं है?

वर्षों से अंतर-निगमीय आमेलन की मांग उठ रही है। कर्मचारी अपने गृह जनपद या परिवार के नजदीक आने का अवसर मांग रहे हैं। अब पावर कॉरपोरेशन में नए नेतृत्व से उम्मीदें जुड़ी हैं। क्या नए अध्यक्ष इस दर्द को समझेंगे, या कर्मचारियों का इंतजार आगे भी जारी रहेगा?

🔥 18 साल का इंतजार: आमेलन बंद, कर्मचारियों की उम्मीदें बेहाल!

उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के अंतर्गत विभिन्न विद्युत वितरण निगमों में कार्यरत लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के कर्मचारियों के अंतर-निगमीय स्थानांतरण और आमेलन का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। कर्मचारियों की ओर से प्रस्तुत मांग पत्र में वर्ष 2008 के बाद से इस प्रक्रिया के प्रभावी रूप से बंद रहने की समस्या उठाई गई है।

इसका मतलब यह नहीं कि प्रत्येक कर्मचारी ने पूरे 18 वर्ष दूर रहकर नौकरी की है, लेकिन आमेलन की प्रक्रिया पर लंबे समय से लगे विराम ने उन कर्मचारियों की समस्या को गंभीर बनाया है, जो नियुक्ति के बाद से अपने गृह क्षेत्र से दूर तैनात हैं और अब अपने परिवार के नजदीक आने का अवसर चाहते हैं।

कर्मचारियों की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि जब विभाग में प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार तैनाती और स्थानांतरण की व्यवस्था चलती रहती है, तो लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के लिए अंतर-डिस्कॉम आमेलन की नीति पर नए सिरे से विचार क्यों नहीं किया जा सकता?

क्या किसी कर्मचारी की नियुक्ति के समय निर्धारित तैनाती ही उसके पूरे सेवाकाल की भौगोलिक नियति बन जानी चाहिए? क्या परिस्थितियां बदलने, माता-पिता के वृद्ध होने, बच्चों के बड़े होने और परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ने के बाद भी कर्मचारी को अपनी समस्या रखने का प्रभावी अवसर नहीं मिलना चाहिए?

ये सवाल किसी नियम को तोड़ने की मांग नहीं हैं। ये उन नियमों के भीतर समाधान तलाशने की मांग हैं, जिनके तहत विभाग भी सुचारु रूप से चल सके और कर्मचारियों को भी राहत मिल सके।

💔 नौकरी मिली, लेकिन परिवार का साथ छूट गया!

कर्मचारी की जिंदगी केवल कार्यालय में उपस्थिति दर्ज कराने, फाइलों का निस्तारण करने और विभागीय आदेशों का पालन करने तक सीमित नहीं होती। कार्यालय से बाहर भी उसकी एक दुनिया होती है—माता-पिता, पत्नी, बच्चे, भाई-बहन और परिवार के प्रति जिम्मेदारियां।

कल्पना कीजिए, कोई कर्मचारी अपने गृह जनपद से सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनात है। घर में बुजुर्ग माता-पिता की तबीयत बिगड़ती है। बच्चे को स्कूल में किसी अभिभावक की जरूरत पड़ती है। जीवनसाथी को किसी कठिन परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय कर्मचारी के सामने दो जिम्मेदारियां एक साथ खड़ी होती हैं—एक तरफ विभागीय सेवा, दूसरी तरफ परिवार की पुकार।

दूर रहकर फोन पर हाल पूछ लेना हर समस्या का समाधान नहीं होता। बीमारी में माता-पिता के पास मौजूद रहने, बच्चों के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में शामिल होने और जीवनसाथी का हाथ बंटाने का विकल्प फोन नहीं दे सकता।

ऐसे में कर्मचारी के मन में उठने वाला सवाल स्वाभाविक है— क्या परिवार के पास तैनाती पाने की उम्मीद करना कोई अनुचित मांग है, या यह एक ऐसी मानवीय जरूरत है जिस पर नियमों के दायरे में विचार होना चाहिए?

कर्मचारी विभाग से विशेषाधिकार नहीं मांग रहे। उनकी मांग है कि उनकी वास्तविक परिस्थितियों को सुना जाए, पात्रता की समीक्षा हो और उन्हें अपने परिवार के नजदीक आने का एक निष्पक्ष अवसर मिले।

⚡ 500 से 1,000 किलोमीटर की दूरी: वेतन मिलता है, लेकिन क्या हर पीड़ा की भरपाई हो जाती है?

कर्मचारियों की ओर से दिए गए विवरण के अनुसार, अनेक लोगों की तैनाती उनके गृह जनपद से लगभग 500 से 1,000 किलोमीटर दूर हुई है। इतनी दूरी का अर्थ केवल लंबा सफर नहीं, बल्कि घर आने-जाने में समय और खर्च, किराये के आवास का बोझ, परिवार से अलग रहने की विवशता और सामाजिक जीवन से दूरी भी है।

कर्मचारी को वेतन मिलता है, लेकिन उस वेतन से दो स्थानों पर जीवन चलाने की मजबूरी भी पैदा हो सकती है। एक तरफ तैनाती वाले शहर में रहने और भोजन का खर्च, दूसरी तरफ गृह जनपद में परिवार की जरूरतें। छुट्टी लेकर घर पहुंचने में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं।

सबसे पीड़ादायक स्थिति तब बनती है, जब कर्मचारी की आर्थिक क्षमता सीमित हो और परिवार को बार-बार उसकी जरूरत पड़ती हो। ऐसी परिस्थिति में वह न पूरी तरह परिवार के साथ रह पाता है और न ही परिवार की परेशानियों से मानसिक रूप से मुक्त हो पाता है।

क्या किसी कर्मचारी की पारिवारिक पीड़ा को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जा सकता है कि उसे सरकारी नौकरी मिली हुई है?

सरकारी सेवा सुरक्षा देती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कर्मचारी की निजी जिंदगी में आने वाली हर कठिनाई को उसकी व्यक्तिगत समस्या बताकर छोड़ दिया जाए। वास्तविक प्रश्न यह है कि उपलब्ध नियमों के भीतर उसे राहत देने का रास्ता क्यों न तलाशा जाए।

👴 बुजुर्ग माता-पिता की उम्र बढ़ती रही, बेटा दूर ड्यूटी करता रहा!

कई परिवारों में माता-पिता की उम्र बढ़ने के साथ उनकी देखभाल की जरूरत भी बढ़ती है। कभी अस्पताल ले जाने की आवश्यकता होती है, कभी दवाइयों और जांच की व्यवस्था करनी होती है, तो कभी केवल पास बैठकर उनका हाल सुनना ही सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है।

दूरस्थ तैनाती पर कार्यरत कर्मचारी हर बार इन जिम्मेदारियों को स्वयं निभा सके, यह संभव नहीं होता। परिवार के दूसरे सदस्यों पर निर्भरता बढ़ती है और कर्मचारी के मन में अपने कर्तव्य को लेकर असहायता पैदा हो सकती है।

इसी तरह बच्चों की शिक्षा, उनके मानसिक विकास और पारिवारिक जीवन में माता-पिता की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। पति-पत्नी के अलग-अलग शहरों में रहने से रोजमर्रा की जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं और परिवार को अतिरिक्त आर्थिक तथा मानसिक दबाव झेलना पड़ सकता है।

यहां सवाल भावुकता पैदा करने का नहीं, बल्कि वास्तविकता स्वीकार करने का है। किसी कर्मचारी की पारिवारिक परिस्थिति गंभीर हो सकती है। किसी दूसरे कर्मचारी की स्थिति सामान्य हो सकती है। इसलिए जरूरत ऐसी नीति की है, जो सभी को एक जैसा लाभ देने का वादा न करे, बल्कि स्पष्ट मानकों के आधार पर पात्र मामलों का निष्पक्ष परीक्षण करे।

📄 2019 का आदेश भी चर्चा में, फिर नई प्रक्रिया की स्थिति क्या है?

उपलब्ध दस्तावेजों में 6 जून 2019 का उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड का पत्र भी शामिल है। यह पत्र वित्तीय वर्ष 2019-2020 की स्थानांतरण नीति के क्रियान्वयन के संबंध में है। इसमें व्यक्तिगत कारणों, चिकित्सा संबंधी परिस्थितियों, बच्चों की शिक्षा तथा पति-पत्नी के सरकारी सेवा में होने जैसी परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। पत्र में निर्धारित शर्तों के अनुसार आवेदन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी बताई गई थी।

यह दस्तावेज इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करता है कि कर्मचारियों की व्यक्तिगत परिस्थितियों और स्थानांतरण से जुड़े विषयों पर कॉरपोरेशन पहले भी नीतिगत स्तर पर विचार करता रहा है।

हालांकि, 2019 के इस आदेश को सभी संवर्गों के लिए अंतर-डिस्कॉम आमेलन की स्थायी अनुमति या वर्तमान में लागू व्यवस्था का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उसके दायरे, संबंधित शर्तों और बाद के आदेशों की आधिकारिक समीक्षा आवश्यक है।

लेकिन यही समीक्षा अब नए नेतृत्व के सामने एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकती है। पुराने आदेशों, वर्तमान नियमों और कर्मचारियों की बदलती परिस्थितियों को एक साथ रखकर यह तय किया जा सकता है कि अंतर-निगमीय आमेलन के लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं और किन नियमों में संशोधन या नई व्यवस्था की जरूरत है।

यदि नियमों में राहत का रास्ता उपलब्ध है, तो पात्र कर्मचारियों को उसका लाभ क्यों न मिले? और यदि मौजूदा व्यवस्था अपर्याप्त है, तो उसकी समीक्षा क्यों न की जाए?

⚖️ एक ही विभाग में काम, लेकिन अवसरों पर सवाल!

कर्मचारियों के बीच यह शिकायत भी उठ रही है कि विभिन्न संवर्गों में स्थानांतरण की व्यवस्थाओं को लेकर अलग-अलग स्थितियां दिखाई देती हैं। लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के कुछ कर्मचारियों को लगता है कि उनकी समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।

इस मुद्दे पर प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि वह संबंधित संवर्गों के नियमों, स्थानांतरण की प्रकृति, प्रशासनिक आवश्यकताओं और आमेलन की पात्रता में अंतर को स्पष्ट करे।

अधिकारियों का स्थानांतरण और कर्मचारियों का अंतर-डिस्कॉम आमेलन हमेशा एक जैसी प्रक्रिया नहीं होते। दोनों के नियम और प्रशासनिक उद्देश्य अलग हो सकते हैं। फिर भी, इस अंतर के कारण कर्मचारियों की समस्या पर विचार करना बंद नहीं होना चाहिए।

यदि कोई कर्मचारी वर्षों से दूरस्थ तैनाती पर है, तो उसके मामले की समीक्षा करने में क्या बाधा है? यदि पारस्परिक सहमति से स्थान बदलने वाले दो पात्र कर्मचारियों से प्रशासनिक समस्या कम हो सकती है, तो क्या ऐसे विकल्प का परीक्षण नहीं किया जा सकता?

सवाल अधिकारियों को सुविधा से वंचित करने का नहीं, कर्मचारियों को नियमों के दायरे में उचित अवसर देने का है।

🔥 भर्ती हुई, तैनाती मिली, लेकिन घर लौटने का विकल्प कहां?

कर्मचारियों की ओर से प्रस्तुत मांग पत्र में वर्ष 2013, 2015, 2017, 2018, 2019, 2022, 2023 और 2024 की भर्तियों से जुड़े कर्मचारियों की समस्याओं का उल्लेख किया गया है।

भर्ती के समय उम्मीदवार विभाग की जरूरत के अनुसार तैनाती स्वीकार करता है। लेकिन समय के साथ उसकी परिस्थितियां बदल सकती हैं। माता-पिता वृद्ध हो सकते हैं, बच्चे स्कूल जाने लगते हैं, जीवनसाथी की नौकरी किसी अन्य जिले में हो सकती है और परिवार में ऐसी जिम्मेदारियां उत्पन्न हो सकती हैं जिनकी कल्पना नियुक्ति के समय नहीं की गई थी।

किसी भी कर्मचारी को यह अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता कि उसे अपनी पसंद के जिले में तैनाती दे दी जाए। रिक्त पद, सेवा नियम, वरिष्ठता और विभागीय आवश्यकता महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सीमाओं के भीतर आवेदन करने, पात्रता जांच कराने और निष्पक्ष निर्णय पाने का अवसर उपलब्ध होना भी जरूरी है।

कर्मचारियों की मांग का मूल यही है— हमें मनचाही पोस्टिंग नहीं, अपने मामले पर निष्पक्ष विचार का अवसर दीजिए।

🏛️ नए अध्यक्ष से नई उम्मीदें: क्या बदलेगा पुराने इंतजार का अध्याय?

पावर कॉरपोरेशन के नए अध्यक्ष के नेतृत्व को लेकर कर्मचारियों में उम्मीदें जगना स्वाभाविक है। लंबे समय से लंबित समस्याओं की समीक्षा और कर्मचारियों की शिकायतों के समाधान के लिए नई पहल किसी भी प्रशासनिक नेतृत्व की सकारात्मक पहचान बन सकती है।

यह मुद्दा नए अध्यक्ष के सामने केवल स्थानांतरण का मामला नहीं, बल्कि कर्मचारी कल्याण, प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत विश्वास का विषय भी है।

यदि प्रबंधन इस मांग पर गंभीरता से विचार करता है, तो सबसे पहले सभी संबंधित संवर्गों के नियमों और पिछले आदेशों की समीक्षा कराई जा सकती है। इसके बाद पात्रता के स्पष्ट मानक, उपलब्ध रिक्त पद, वरिष्ठता, सेवा अवधि और गंभीर पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर एक पारदर्शी प्रक्रिया तैयार की जा सकती है।

साथ ही, पारस्परिक स्थानांतरण के मामलों की व्यवहार्यता जांची जा सकती है और पात्र कर्मचारियों को एक अतिरिक्त आवेदन का अवसर देने की मांग पर निर्णय लिया जा सकता है।

ऐसी पहल का अर्थ यह नहीं होगा कि सभी कर्मचारियों को एक साथ उनकी इच्छित जगह पर भेज दिया जाए। इसका अर्थ होगा कि वर्षों से उठ रही मांग को व्यवस्थित तरीके से सुना जाए और उसका निर्णय स्पष्ट कारणों के साथ किया जाए।

नए अध्यक्ष महोदय, कर्मचारियों की उम्मीदें किसी चमत्कार की नहीं हैं। वे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, उनकी परिस्थितियों को समझा जाए और नियमों के भीतर समाधान का रास्ता निकाला जाए।

📢 मुख्यमंत्री से मांग, अब ऊर्जा विभाग और प्रबंधन की बारी

कर्मचारियों की ओर से मुख्यमंत्री को संबोधित मांग पत्र भेजकर अंतर-निगमीय आमेलन की प्रक्रिया दोबारा शुरू करने और एक अतिरिक्त आवेदन का अवसर देने का अनुरोध किया गया है।

इस मांग पर ऊर्जा विभाग, पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कर्मचारियों को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि मौजूदा नियम क्या कहते हैं, आमेलन प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति क्या है और इस मांग पर निर्णय लेने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

लंबे समय तक अनिश्चितता बने रहने से कर्मचारियों के बीच निराशा बढ़ सकती है। इसलिए केवल आश्वासन देने के बजाय समयबद्ध समीक्षा और स्पष्ट आधिकारिक जवाब अधिक उपयोगी होगा।

यदि मांग स्वीकार नहीं की जा सकती, तो उसके कारण भी स्पष्ट किए जाने चाहिए। और यदि नियमों के भीतर राहत संभव है, तो पात्र कर्मचारियों के लिए प्रक्रिया शुरू करने पर विचार होना चाहिए।

✊ कर्मचारियों की प्रमुख मांगें

लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के कर्मचारियों की ओर से उठाई गई मांगों का सार इस प्रकार है—

1. अंतर-डिस्कॉम आमेलन प्रक्रिया दोबारा खोलने पर निर्णय लिया जाए।
2. पात्र कर्मचारियों को आवेदन का एक अतिरिक्त अवसर दिया जाए।
3. पारस्परिक स्थानांतरण के लिए स्पष्ट, व्यावहारिक और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
4. लंबे समय से दूरस्थ तैनाती पर कार्यरत कर्मचारियों के मामलों की समीक्षा की जाए।
5. गंभीर चिकित्सा और पारिवारिक परिस्थितियों को निर्धारित मानकों के तहत प्राथमिकता से देखा जाए।
6. वरिष्ठता, सेवा अवधि, रिक्त पद और विभागीय आवश्यकता के आधार पर निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए।
7. शासन और UPPCL प्रबंधन मांग पर अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करें तथा आगे की कार्यवाही की समयसीमा बताएं।

 🚨 UPPCL MEDIA के अहम सवाल: आखिर कब तक इंतजार?

- क्या लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के अंतर-निगमीय आमेलन की वर्तमान स्थिति पर कोई व्यापक समीक्षा की जाएगी?
- क्या वर्ष 2019 के स्थानांतरण संबंधी आदेश और उसके बाद जारी निर्देशों की स्थिति स्पष्ट की जाएगी?
- क्या पात्र कर्मचारियों को एक अतिरिक्त आवेदन का अवसर देने की मांग पर विचार होगा?
- क्या पारस्परिक स्थानांतरण की व्यवहार्यता का परीक्षण किया जाएगा?
- क्या नए अध्यक्ष कर्मचारियों की इस लंबित समस्या को प्राथमिकता देकर आधिकारिक निर्णय की दिशा में पहल करेंगे?
- क्या कर्मचारियों को यह बताया जाएगा कि उनकी मांग स्वीकार करने, आंशिक राहत देने या अस्वीकार करने के पीछे क्या प्रशासनिक कारण हैं?

इन सवालों के जवाब किसी आरोप या अनुमान से नहीं, बल्कि प्रबंधन के स्पष्ट और आधिकारिक रुख से मिलने चाहिए।

📰 UPPCL MEDIA का मानना है कि अध्यक्ष - पावर कारपोरेशन "कर्मचारियों को केवल ड्यूटी के लिए नहीं, इंसान समझकर भी देखे!"

बिजली विभाग की व्यवस्था को चलाने में हर संवर्ग का योगदान महत्वपूर्ण है। अधिकारी हों, अभियंता हों, लिपिक हों या तकनीशियन—सभी अपने-अपने स्तर पर विभागीय कामकाज में भूमिका निभाते हैं। ऐसे में कर्मचारी कल्याण को केवल औपचारिक नीति तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।

लिपिकीय एवं तकनीशियन संवर्ग के कर्मचारियों की आमेलन संबंधी मांग को भी नियमों, प्रशासनिक जरूरतों और मानवीय परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाकर देखा जाना चाहिए। किसी कर्मचारी को उसकी पसंद के जिले में तैनाती की गारंटी नहीं दी जा सकती, लेकिन पात्रता के आधार पर निष्पक्ष विचार की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

यदि वर्षों से उठ रही मांग पर पारदर्शी समीक्षा होती है, तो इससे केवल कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच विश्वास को भी मजबूती मिल सकती है।

नए अध्यक्ष महोदय, इतिहास केवल बड़े प्रशासनिक फैसलों से नहीं बनता; कभी-कभी वर्षों से परेशान कर्मचारियों की एक वास्तविक समस्या का न्यायपूर्ण समाधान भी नई पहचान बन जाता है।

आज उन कर्मचारियों को आश्वासन से आगे बढ़कर स्पष्ट नीति, निष्पक्ष सुनवाई और समयबद्ध निर्णय की जरूरत है। उनकी पीड़ा को सुनना किसी पर उपकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रशासनिक व्यवस्था की कसौटी है।

18 वर्षों से आमेलन का इंतजार कर रहे कर्मचारियों की आवाज को अनसुना न किया जाए। नए नेतृत्व से यही उम्मीद है कि वह इस मुद्दे की समीक्षा कर पात्र कर्मचारियों के लिए राहत का रास्ता तलाशेगा।

UPPCL MEDIA की अपील:

पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन कर्मचारियों की इस मांग पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करे। आमेलन प्रक्रिया दोबारा शुरू करने, पारस्परिक स्थानांतरण की व्यवस्था और एक अतिरिक्त आवेदन का अवसर देने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाए। नियमों के दायरे में समाधान तलाशकर उन परिवारों को राहत देने की पहल हो, जो वर्षों से इस इंतजार का बोझ उठा रहे हैं।

महत्वपूर्ण संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट कर्मचारियों की ओर से उपलब्ध कराए गए मांग पत्र, 6 जून 2019 के स्थानांतरण नीति संबंधी दस्तावेज और प्रस्तुत विवरणों पर आधारित है। वर्ष 2008 के बाद आमेलन की पूरी नीतिगत स्थिति, प्रभावित कर्मचारियों की वास्तविक संख्या और वर्तमान प्रबंधन के निर्णय की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। UPPCL प्रबंधन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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खबर प्रकाशित

10 Oct, 08:08 am

🚨 UPPCL MEDIA की विशेष रिपोर्ट # 18 साल से परिवार से दूर, आमेलन पर ताला! आखिर बाबुओं के दर्द पर कब पिघलेगा...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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