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निवेश मित्र 3.0 में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ या ‘पेमेंट के: बाद भी इंतजार’? छह लाख की एस्टीमेट, स्क्रीन पर ‘Transaction Failed’ और आवेदक के हाथ खाली

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अधिशासी अभियंता को एबीसीडी नहीं मालूम या फिर उपभोक्ता की सुनवाई ही नहीं?

पुलिस कॉलोनी के विद्युत कनेक्शन के लिए छह महीने तक कार्यालय के चक्कर लगाता रहा आवेदक, जिम्मेदार अधिकारी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

हरदोई के शाहाबाद से UPPCL MEDIA की पड़ताल: छह महीने से बिजली कनेक्शन के लिए दौड़ता आवेदक, ₹5,000 की फीस का भुगतान सफल दिखा; फिर ₹6.06 लाख की एस्टीमेट राशि का भुगतान अटका—पोर्टल के स्क्रीनशॉट ने खड़े किए गंभीर सवाल

शाहाबाद/हरदोई। विद्युत विभाग में उपभोक्ताओं की समस्याओं के त्वरित निस्तारण और समयबद्ध कार्रवाई के तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन शाहाबाद विद्युत वितरण खंड में सामने आया एक मामला इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।

बताया जा रहा है कि पुलिस कॉलोनी के विद्युत कनेक्शन से संबंधित एक आवेदन को लेकर आवेदक पिछले छह महीने से अधिक समय तक विद्युत विभाग के कार्यालय के चक्कर लगाता रहा। खास बात यह है कि आवेदक कोई सामान्य निजी उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक सरकारी विभाग से संबंधित है।

आरोप है कि संबंधित प्रकरण में अपेक्षित कार्रवाई न होने के कारण आवेदक को बार-बार कार्यालय आना पड़ा। छह महीने से अधिक समय तक समस्या का समाधान न होना सीधे तौर पर संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।

आखिर छह महीने तक फाइल कहां अटकी रही?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पुलिस कॉलोनी के विद्युत कनेक्शन के लिए आवेदन और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी थीं, तो छह महीने से अधिक समय तक कनेक्शन क्यों नहीं हुआ?

क्या अधिशासी अभियंता स्तर पर प्रकरण की निगरानी नहीं की गई?

क्या अधीनस्थ अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए?

या फिर सरकारी विभाग के आवेदक को भी सामान्य उपभोक्ता की तरह कार्यालय के चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा?

'चढ़ावा' नहीं मिला तो फाइल की रफ्तार थम गई?

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप यह सामने आ रहा है कि 'चढ़ावा' नहीं मिलने के कारण कथित तौर पर काम आगे नहीं बढ़ा। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष लिया जाना भी जरूरी है।

लेकिन यदि यह आरोप सही है तो मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और सुविधा शुल्क की संस्कृति का गंभीर प्रश्न बन जाता है।

अधिशासी अभियंता की जिम्मेदारी पर सवाल

अधिशासी अभियंता किसी भी विद्युत वितरण खंड का महत्वपूर्ण अधिकारी होता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब एक सरकारी विभाग से जुड़ा प्रकरण छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहा, तो अधिशासी अभियंता भजन लाल ने इसकी समयबद्ध समीक्षा क्यों नहीं की?

  • क्या उनके कार्यालय में लंबित प्रकरणों की नियमित मॉनिटरिंग होती है?
  • क्या आवेदकों को अनावश्यक रूप से कार्यालय के चक्कर लगाने से रोकने की कोई व्यवस्था है?
  • और यदि व्यवस्था है तो पुलिस कॉलोनी का यह प्रकरण उसमें कैसे छूट गया?

छह महीने की दौड़ किसकी जिम्मेदारी?

एक सरकारी विभाग को विद्युत कनेक्शन जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए छह महीने तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह निश्चित रूप से व्यवस्था की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करता है।

उपभोक्ता से समय पर बिल और राजस्व की अपेक्षा रखने वाला विभाग क्या उपभोक्ता के समय की कीमत भी समझता है?

इस मामले में अब जरूरत केवल कनेक्शन जारी करने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि आवेदन कब प्राप्त हुआ, किस स्तर पर कितना समय लंबित रहा, किस अधिकारी के पास फाइल रही और छह महीने की देरी के लिए जिम्मेदार कौन है।

मामले की निष्पक्ष जांच होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह महज प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे कोई अन्य कारण।

अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी इस छह महीने की 'दौड़' का हिसाब लेते हैं या फिर मामला भी बिजली विभाग की लंबित फाइलों की तरह दबकर रह जाता है।

सरकार की डिजिटल व्यवस्था का दावा है—कम समय, कम कागज और कम दफ्तर के चक्कर। लेकिन हरदोई के शाहाबाद से सामने आया एक मामला इस दावे की जमीनी तस्वीर पर तीखे सवाल खड़े कर रहा है।

उत्तर प्रदेश का Nivesh Mitra 3.0 आधिकारिक तौर पर एक सिंगल-विंडो सिस्टम है, जिसका उद्देश्य लाइसेंस, एनओसी और अन्य अनुमोदनों की प्रक्रिया को ऑनलाइन और आसान बनाना है। पोर्टल खुद ‘Completely Online’, ‘Real-Time Tracking’ और ‘Fast Approvals’ जैसी सुविधाओं का दावा करता है।

लेकिन शाहाबाद के एक आवेदक के दस्तावेजों और स्क्रीनशॉट में कहानी कुछ और ही नजर आ रही है।

छह महीने तक कनेक्शन की फाइल घूमती रही!

मामला सवायजपुर पुलिस स्टेशन रेजिडेंशियल/पुलिस कॉलोनी के विद्युत कनेक्शन से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक आवेदक ने निवेश मित्र के माध्यम से प्रक्रिया शुरू की। आरोप है कि अधिशासी अभियंता भजनलाल स्तर पर एस्टीमेट और आवेदन की प्रक्रिया में देरी के कारण उसे करीब छह महीने से अधिक समय तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।

मामला जब UPPCL MEDIA के संज्ञान में आया तो मध्यांचल डिस्कॉम के संबंधित उच्च अधिकारियों के समक्ष शिकायत/आपत्ति रखी गई। इसके बाद प्रक्रिया में तेजी आने की बात सामने आई, लेकिन डिजिटल पोर्टल की अगली ‘परीक्षा’ ने पूरा मामला और पेचीदा कर दिया।

पहले ₹5,000 जमा—रसीद आई, फिर लाखों की बारी!

निवेश मित्र से मिले दस्तावेज में Site Inspection and Estimation Service के लिए ₹5,000 की फीस का भुगतान 21 अगस्त 2026 को ‘PAID’ दर्ज दिखाई देता है।

यानी पांच हजार रुपये की पहली बाधा पार हुई।

लेकिन इसके बाद जो सामने आया, वही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।

एक अन्य स्क्रीनशॉट में निवेश मित्र पोर्टल पर 22 अगस्त 2026 को ₹6,06,454 की एस्टीमेट Payment दिखाई दे रही है। स्क्रीन पर यह राशि Uttar Pradesh Power Corporation Limited द्वारा उठाई गई अतिरिक्त भुगतान मांग के रूप में प्रदर्शित है।

और जब आवेदक भुगतान करने पहुंचा तो, भुगतान करने के उपरान्त सामने आया—

“TRANSACTION FAILED”

यानी लाखों रुपये की मांग स्क्रीन पर मौजूद और भुगतान प्रक्रिया में तकनीकी विफलता का संदेश!

₹6 लाख की रकम कोई ‘रिफ्रेश’ बटन नहीं है साहब!

यहां सवाल सिर्फ पोर्टल की तकनीकी खराबी का नहीं है।

₹5,000 की प्रोसेसिंग फीस किसी तरह जमा हो जाए, लेकिन करीब ₹6.06 लाख की एस्टीमेट भुगतान के समय ट्रांजेक्शन फेल हो जाए, तो आम आवेदक आखिर जाए कहां?

क्या दोबारा भुगतान करे?

अगर पैसा खाते से कट जाए और पोर्टल भुगतान को असफल बताए तो जिम्मेदारी किसकी होगी?

और अगर पैसा न कटे लेकिन भुगतान फेल हो जाए, तो कनेक्शन की प्रक्रिया कितने दिन और रुकेगी?

लाखों रुपये का भुगतान कोई मोबाइल रिचार्ज नहीं कि ‘फिर से ट्राई’ कर दिया जाए।

पोर्टल कहता है ‘Fast Approval’, आवेदक कह रहा है ‘पहले मेरी फाइल तो चलाओ!’

सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है।

निवेश मित्र की आधिकारिक वेबसाइट पर पोर्टल को तेज, ऑनलाइन, पारदर्शी और समय बचाने वाला सिस्टम बताया गया है। आधिकारिक साइट यह भी बताती है कि कुछ सेवाएं अभी Nivesh Mitra 3.0 पर उपलब्ध न होने की स्थिति में Nivesh Mitra 2.0 के जरिए आवेदन करना पड़ सकता है।

लेकिन शाहाबाद के इस प्रकरण में सवाल यह है कि जिस व्यवस्था का मकसद आवेदक को विभागीय चक्कर से बचाना है, उसी में आवेदन से लेकर एस्टीमेट और भुगतान तक इतनी अड़चन क्यों?

मामला सिर्फ ‘पोर्टल खराब है’ कहकर खत्म नहीं होना चाहिए

यहां UPPCL और संबंधित डिस्कॉम को केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए कि ‘टेक्निकल समस्या है।’

क्योंकि मामला एक सामान्य ऑनलाइन फॉर्म का नहीं, बल्कि विद्युत कनेक्शन और लाखों रुपये की अतिरिक्त भुगतान मांग का है।

जरूरत है कि इस पूरे प्रकरण की जांच में कम से कम इन सवालों का जवाब सामने आए—

  • भुगतान विफल होने पर पोर्टल और बैंकिंग सिस्टम में राशि की स्थिति कैसे तय होगी?
  • यदि पैसा कटता है तो रिफंड की समयसीमा क्या है?
  • क्या आवेदक को दोबारा आवेदन करने के कारण फिर से कोई शुल्क देना पड़ा?
  • छह महीने से अधिक की देरी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
  • क्या अन्य आवेदकों के भी ऐसे भुगतान फेल या लंबित हैं?

‘डिजिटल इंडिया’ में आवेदक को डिजिटल चक्कर क्यों?

यह मामला किसी एक आवेदक की परेशानी भर मानकर छोड़ देना आसान है।

लेकिन यदि एक आवेदक को पहले कार्यालयों के चक्कर, फिर आवेदन दोबारा करने की सलाह, फिर फीस भुगतान, फिर एस्टीमेट और अंत में ₹6 लाख से अधिक की भुगतान स्क्रीन पर ‘Transaction Failed’ दिखाई देती है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है।

डिजिटल व्यवस्था का मतलब यह नहीं कि फाइल दिखाई देती रहे और समाधान गायब रहे।

आवेदक को कनेक्शन चाहिए—न कि पोर्टल के स्क्रीनशॉटों का संग्रह।

UPPCL MEDIA का सीधा सवाल

अगर निवेश मित्र ‘Single Window’ है तो आवेदक को इतने दरवाजे क्यों खटखटाने पड़ रहे हैं?

अगर सिस्टम ‘Fast Approval’ है तो छह महीने की दौड़ क्यों?

अगर भुगतान व्यवस्था सुरक्षित है तो लाखों की भुगतान प्रक्रिया पर ‘Transaction Failed’ क्यों?

खबर से आगे, जवाब तक

यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट

खबर प्रकाशित

26 Aug, 12:09 pm

अधिशासी अभियंता को एबीसीडी नहीं मालूम या फिर उपभोक्ता की सुनवाई ही नहीं? पुलिस कॉलोनी के विद्युत कनेक्शन के...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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