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निलंबन के बाद बुलंदशहर बिजली महकमे में संग्राम: राहुल शर्मा पर कार्रवाई, चीफ और अधीक्षण अभियंता पर जातीय भेदभाव से लेकर ठेकेदार से मिलीभगत तक के गंभीर आरोप

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6000 केवीए संयोजन विवाद में अधिशासी अभियंता निलंबित, बुलंदशहर के मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

बुलंदशहर/मेरठ। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में सिकंदराबाद विद्युत वितरण खंड के अधिशासी अभियंता राहुल शर्मा के निलंबन के बाद विभागीय कार्रवाई अब गंभीर विवाद का रूप लेती दिखाई दे रही है। 12 अगस्त 2026 को जारी कार्यालय आदेश में राहुल शर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर मुख्यालय से संबद्ध किया गया है। आदेश में उन पर कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही, अनावश्यक क्वेरी, मनमाना आचरण, संयोजन प्रक्रिया में विलंब, आवेदक के उत्पीड़न तथा निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन निरस्त किए जाने से जुड़े गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है।

लेकिन निलंबन आदेश की कहानी के साथ अब एक दूसरी कहानी भी सामने आ रही है—वह कहानी जिसमें अधिकारी कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए मुख्य अभियंता वितरण बुलंदशहर संजीव कुमार और अधीक्षण अभियंता महेश कुमार अहीरवार पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। इन आरोपों में जातीय भेदभाव, दबाव, ठेकेदार से कथित मिलीभगत और विभागीय हितों की अनदेखी जैसे आरोप शामिल हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

एक संयोजन बना निलंबन का आधार, लेकिन पत्राचार ने खड़े किए सवाल

उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों के अनुसार मामला मैसर्स अपोलो कोटेड प्रोडक्ट्स यूनिट-2 के 6000 किलोवाट संयोजन से जुड़ा है। आवेदन निवेश मित्र पोर्टल पर किया गया था। इसके बाद अधिशासी अभियंता स्तर से टीएफआर, ट्रांसमिशन एवं डिस्ट्रीब्यूशन से संबंधित तकनीकी प्रक्रिया और वैकल्पिक विद्युत स्रोत को लेकर लगातार पत्राचार किया गया।

दस्तावेजों में 9 जुलाई, 14 जुलाई, 15 जुलाई, 18 जुलाई, 20 जुलाई, 25 जुलाई, 27 जुलाई, 28 जुलाई और 30 जुलाई 2026 सहित विभिन्न तिथियों में हुए पत्राचार का उल्लेख है। इससे यह सवाल जरूर उठता है कि जिस प्रकरण में लगातार तकनीकी पत्राचार और टीएफआर की प्रक्रिया चल रही थी, उसमें सिर्फ देरी को ही जिम्मेदारी तय करने का आधार कैसे बनाया गया?

यही वह बिंदु है जिस पर राहुल शर्मा की ओर से अब गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

पोर्टल पर आवेदन रिजेक्ट होने की कहानी भी विवाद के केंद्र में

आरोप है कि निवेश मित्र पोर्टल पर किसी अन्य संयोजन को बाबू स्तर से रिजेक्ट किए जाने और पोर्टल अपडेट होने के बाद संबंधित संयोजन भी रिजेक्ट दिखाई देने लगा था। राहुल शर्मा का दावा है कि इसकी जानकारी अधिकारियों को पहले दिन से पत्रों और व्हाट्सऐप के माध्यम से दी जाती रही।

यदि यह दावा सही है तो जांच का सबसे बड़ा सवाल यही होना चाहिए कि—

क्या पोर्टल पर हुई तकनीकी/प्रक्रियात्मक गड़बड़ी की स्वतंत्र जांच की गई? क्या संबंधित कर्मचारियों के बयान लिए गए? क्या पूरे पत्राचार को निलंबन की संस्तुति में शामिल किया गया? और क्या केवल अंतिम परिणाम के आधार पर अधिशासी अभियंता की जिम्मेदारी तय कर दी गई?

‘स्वतंत्र फीडर’ बनाम ‘मौजूदा बे से सप्लाई’—यहीं से शुरू हुआ असली विवाद?

उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि प्रकरण में स्वतंत्र फीडर/विद्युत तंत्र से संयोजन देने को लेकर तकनीकी प्रक्रिया आगे बढ़ी। दूसरी ओर राहुल शर्मा की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि संबंधित परिसर के बराबर स्थित दूसरे संयोजन की लाइन/बे से तकनीकी रूप से आपूर्ति दिए जाने की संभावना पर भी अधिकारियों को अवगत कराया गया था।

यहीं से आरोप और प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हुआ।

राहुल शर्मा की ओर से आरोप लगाया गया है कि विभागीय हित में कम खर्च वाले वैकल्पिक तकनीकी विकल्प पर विचार करने के बजाय स्वतंत्र व्यवस्था तैयार कराने का दबाव बनाया गया। आरोप यह भी है कि इस प्रक्रिया में संबंधित ठेकेदार की भूमिका थी और ठेकेदार के माध्यम से आर्थिक लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।

यह आरोप बेहद गंभीर है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए अब इस पूरे मामले की तकनीकी और वित्तीय जांच किसी ऐसे अधिकारी/समिति से कराई जानी चाहिए जो इस विवाद से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी न हो।

निलंबन आदेश में क्या कहा गया?

12 अगस्त 2026 के कार्यालय आदेश में प्रकरण की जांच के आधार पर राहुल शर्मा के विरुद्ध गंभीर आरोप पाए जाने की बात कही गई है। आदेश में उन्हें अपने पद के अनुरूप कर्तव्यों के निर्वहन में घोर लापरवाही, अनावश्यक क्वेरी, मनमाना आचरण, संयोजन में विलंब और आवेदक के उत्पीड़न के साथ निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन निरस्त किए जाने के संबंध में आरोपित किया गया है।

आदेश के अनुसार इन आरोपों को गंभीर कदाचार की श्रेणी का मानते हुए राहुल शर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया तथा आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मुख्यालय से संबद्ध किया गया है।

लेकिन विभागीय कार्रवाई में आरोप साबित होना और आरोप लगाए जाना—दो अलग-अलग बातें हैं। अब आगे की जांच ही तय करेगी कि आरोप कितने सही हैं।

‘एक महीने से कहानी बुनी जा रही थी’—निलंबित अधिकारी का दावा

निलंबन के बाद राहुल शर्मा की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पिछले करीब एक महीने से पूरे मामले को लेकर पत्राचार चल रहा था और संयोजन से जुड़े प्रत्येक पहलू की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी गई थी।

उनका आरोप है कि उन्होंने संबंधित बाबू पर कार्रवाई कराकर स्वयं को बचाने के बजाय मामले को विभागीय स्तर पर सुलझाने की कोशिश की। उनका कहना है कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उन्हीं के द्वारा दिए गए पत्राचार को बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।

यानी जिस पत्राचार को अधिकारी अपनी सफाई का दस्तावेज बता रहे हैं, वही पत्राचार अब उनके खिलाफ कार्रवाई की फाइल का हिस्सा बन गया—यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

चीफ और अधीक्षण अभियंता पर जातीय भेदभाव के आरोप

मामले को और गंभीर बनाते हुए राहुल शर्मा की ओर से मुख्य अभियंता वितरण बुलंदशहर संजीव कुमार और अधीक्षण अभियंता महेश कुमार अहीरवार पर सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के प्रति कथित पूर्वाग्रह और जातीय भेदभाव के आरोप लगाए गए हैं।

आरोप लगाया गया है कि स्थानांतरण के दौरान सामान्य वर्ग के कुछ कर्मचारियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया गया और इसे लेकर कार्यालय के कर्मचारियों में असंतोष है। इसी क्रम में राहुल शर्मा का नाम लेकर आरोप लगाया गया है कि उनके खिलाफ भी इसी मानसिकता के कारण कार्रवाई की गई।

UPPCL MEDIA स्पष्ट करता है कि जातीय भेदभाव के ये आरोप संबंधित पक्ष की ओर से लगाए गए हैं और उपलब्ध दस्तावेजों से इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। ऐसे गंभीर आरोपों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

‘शर्मा’ सरनेम को सजा?—आरोप की जांच कौन करेगा?

आरोपों में यहां तक कहा गया है कि सामान्य वर्ग से जुड़े कर्मचारियों को उनके सामाजिक वर्ग/सरनेम के आधार पर कथित रूप से निशाना बनाया जा रहा है और राहुल शर्मा के मामले को भी इसी कथित मानसिकता से जोड़ा गया है।

यदि यह आरोप गलत है तो भी इसे स्पष्ट करने की जिम्मेदारी जांच की है और यदि आरोप सही निकलते हैं तो यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे विभागीय प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल होगा।

सरकारी विभाग में अधिकारी की पहचान उसकी जाति या सरनेम से नहीं बल्कि उसके कार्य और जवाबदेही से होनी चाहिए।

ठेकेदार से मिलीभगत के आरोप सबसे गंभीर

मामले में ठेकेदार के माध्यम से मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता पर कथित आर्थिक हित साधने के आरोप भी लगाए गए हैं। दावा किया गया है कि संबंधित ठेकेदार ने बड़े विद्युत कार्यों के टेंडर लिए हैं और स्वतंत्र फीडर/लाइन व्यवस्था के जरिए अधिक काम एवं अधिक भुगतान की स्थिति बन सकती थी।

[caption id="attachment_35415" align="aligncenter" width="1254"]मुख्य अभियंता (वितरण), बुलंदशहर - संजीव कुमार                                                                                                                   मुख्य अभियंता (वितरण), बुलंदशहर - संजीव कुमार [/caption]

लेकिन यहां भी सवाल आरोप का नहीं, जांच का है।

यदि वास्तव में ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का प्रयास हुआ, तो टेंडर दस्तावेज, कार्यादेश, अनुमानित लागत, तकनीकी स्वीकृति, टीएफआर, साइट रिपोर्ट, भुगतान और संबंधित अधिकारियों के निर्णयों की जांच से तस्वीर साफ हो सकती है।

और यदि आरोप निराधार हैं तो जांच ही उन अधिकारियों को भी साफ-साफ क्लीन चिट दे सकती है।

असली सवाल: निलंबन से पहले पूरी फाइल पढ़ी गई थी या नहीं?

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि—

क्या निलंबन की संस्तुति भेजने से पहले राहुल शर्मा द्वारा किए गए सभी पत्राचार को रिकॉर्ड पर लिया गया?

  • क्या निवेश मित्र पोर्टल का तकनीकी लॉग देखा गया?
  • क्या यह पता लगाया गया कि आवेदन किस स्तर पर और किस कारण से रिजेक्ट हुआ?
  • क्या बाबू/पोर्टल ऑपरेटर की भूमिका की जांच हुई?
  • क्या स्वतंत्र फीडर और मौजूदा विद्युत तंत्र से संयोजन देने की लागत का तुलनात्मक परीक्षण किया गया?

क्या संबंधित ठेकेदार की भूमिका की जांच की गई?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या निलंबन की संस्तुति करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी उसी निष्पक्षता से जांच हुई, जिस निष्पक्षता से अधिशासी अभियंता पर आरोप लगाए गए?

अब जांच केवल राहुल शर्मा की नहीं, पूरे प्रकरण की होनी चाहिए

निलंबन आदेश अपने स्थान पर है और विभागीय अनुशासनात्मक प्रक्रिया आगे चलेगी। लेकिन उपलब्ध पत्राचार और सामने आए आरोपों के बाद मामला केवल एक अधिशासी अभियंता के निलंबन तक सीमित नहीं रह गया है।

अब जरूरत है कि मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता, संबंधित ठेकेदार, निवेश मित्र पोर्टल की प्रक्रिया और पूरे तकनीकी निर्णय की स्वतंत्र जांच कराई जाए।

क्योंकि अगर राहुल शर्मा दोषी हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन अगर तकनीकी प्रक्रिया में उनकी बात सही थी और उन्हें दबाव में गलत तरीके से फंसाया गया है तो यह भी सामने आना चाहिए।

और यदि जातीय भेदभाव तथा ठेकेदार से मिलीभगत के आरोप झूठे हैं तो आरोप लगाने वालों से भी जवाब लिया जाना चाहिए।

UPPCL MEDIA का सवाल

बिजली विभाग में ‘सही काम करने’ की कीमत निलंबन होगी या तथ्यों के आधार पर निर्णय होगा?

किसी अधिकारी का अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, सरकारी पद व्यक्तिगत साम्राज्य नहीं होता। रावण का अहंकार भी नहीं बचा था—तो फिर सरकारी कुर्सी किस खेत की मूली है?

समय हर अधिकारी का हिसाब करता है। अब देखना यह है कि इस मामले में विभागीय जांच केवल एक अधिकारी की होगी या पूरे घटनाक्रम की।

खबर से आगे, जवाब तक

अभी तक का अपडेट

खबर प्रकाशित

14 Aug, 03:08 am

6000 केवीए संयोजन विवाद में अधिशासी अभियंता निलंबित, बुलंदशहर के मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता की भूमिका पर...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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