🚨 कासगंज स्टोर में ‘सामग्री का अकाल’, विभागीय सिस्टम बेहाल! पैसा जमा कराने में फुर्ती, काम कराने की बारी आई तो गायब सामान! विधायक निधि के काम भी अटके—आखिर बिजली विभाग का स्टोर चला कौन रहा है?
यूपीपीसीएल मीडिया | विशेष पड़ताल
कासगंज। बिजली विभाग में आम उपभोक्ता से भुगतान और औपचारिकताओं के लिए तत्परता की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब विभाग की अपनी कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो जवाबदेही का सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होता है। कासगंज से सामने आई शिकायत ने विद्युत सामग्री की उपलब्धता, स्टोर प्रबंधन और लंबित कार्यों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि आवश्यक सामग्री के अभाव में कई कार्य महीनों से अटके हैं, जबकि कुछ प्रस्तावों के संबंध में पूर्ण धनराशि जमा होने का दावा भी किया गया है।
प्रस्ताव मौजूद, काम कराने की मांग मौजूद, धनराशि जमा होने का दावा मौजूद—लेकिन काम पूरा करने के लिए जरूरी सामान ही नदारद! आखिर यह कैसी कार्ययोजना है, जिसमें काम की जरूरत तो दिखाई देती है, लेकिन सामग्री की व्यवस्था समय रहते नहीं हो पाती?

तीन महीने से सामग्री का इंतजार, आखिर जिम्मेदार कौन?
साझा किए गए संदेश के अनुसार, कासगंज स्टोर में पिछले लगभग तीन महीने से 11 केवी वेजल कंडक्टर, 11 केवी पीसीसी पोल (8.5 मीटर), 11 केवी पिन इंसुलेटर और 13 मीटर एसटीपी पोल जैसी आवश्यक विद्युत सामग्री उपलब्ध नहीं होने की शिकायत की गई है। संदेश में दावा किया गया है कि सामग्री की अनुपलब्धता के कारण कई कार्य ठप पड़े हैं और लंबित प्रस्तावों पर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
अब सवाल यह है कि यदि सामग्री की कमी पहले से थी, तो उसकी भरपाई के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए? यदि मांग भेजी जा चुकी थी, तो आपूर्ति क्यों नहीं हुई? और यदि संबंधित अधिकारियों को इस समस्या की जानकारी थी, तो लंबित कार्यों को पूरा कराने के लिए क्या ठोस कार्रवाई की गई?
- क्या विभागीय व्यवस्था का पूरा गणित इसी पर टिक गया है कि प्रस्ताव बना दो, फाइल आगे बढ़ा दो और जब काम पूरा करने की बारी आए तो जवाब मिल जाए—स्टोर में सामान नहीं है?
- यदि ऐसा नहीं है, तो विभाग को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। सामग्री की कमी कब से है, कितनी सामग्री की जरूरत है, मांग कब भेजी गई और आपूर्ति की समय सीमा क्या है?
विधायक निधि के कार्य भी प्रभावित होने का दावा—जवाब कौन देगा?
शिकायत में कासगंज के विधायक की निधि से संबंधित कार्यों के प्रभावित होने की बात भी कही गई है। संदेश में प्रस्ताव संख्या 7001069033, दिनांक 02 जुलाई 2026 तथा प्रस्ताव संख्या 7001031174, दिनांक 02 मई 2026 का उल्लेख करते हुए पूर्ण धनराशि जमा होने के बावजूद कार्य लंबित होने का दावा किया गया है।
यदि संबंधित प्रस्तावों में सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हैं और धनराशि जमा होने की पुष्टि होती है, तो सामग्री की व्यवस्था कर कार्यों को आगे बढ़ाना किसकी जिम्मेदारी है?
विधायक निधि से जुड़े कार्य हों या आम उपभोक्ताओं के विद्युत कार्य—हर मामले में देरी का स्पष्ट कारण और समाधान की समयसीमा सामने आनी चाहिए। जनता को प्रस्ताव संख्या याद रखनी चाहिए या अपने काम के पूरा होने की तारीख?
प्रस्ताव जारी करना उपलब्धि नहीं, काम पूरा करना असली जवाबदेही है।


प्रस्तावों की लंबी सूची, लेकिन जमीन पर काम कब?
साझा किए गए संदेश में कई अन्य प्रस्तावों का उल्लेख किया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- ब्रह्मदेव जान्हवी संस्कृत स्कूल — प्रस्ताव संख्या 7001069033, दिनांक 02 जुलाई 2026।
- प्रज्ञानम इंटर कॉलेज — प्रस्ताव संख्या 7001069105, दिनांक 02 जुलाई 2026।
- वृंदावन एग्रो — प्रस्ताव संख्या 7001031174, दिनांक 20 मई 2026।
- सद्भाव मंडप, मयाऊं — प्रस्ताव संख्या 7001038758, दिनांक 29 मई 2026।
- सहदुल्ला — प्रस्ताव संख्या 7001101212, दिनांक 14 अगस्त 2026।
- गिरिशचंद — प्रस्ताव संख्या 7001112342, दिनांक 29 अगस्त 2026।
- एमएस न्यू बाबा एलएमवी-6 राइस मिल — प्रस्ताव संख्या 7001128640, दिनांक 23 सितंबर 2026।
इनके अतिरिक्त अन्य प्रस्तावों के भी लंबित होने की बात कही गई है। इन प्रस्तावों की वर्तमान स्थिति और प्रत्येक मामले में सामग्री की वास्तविक जरूरत का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। फिर भी, यदि अनेक कार्य एक ही स्टोर में सामग्री की कमी के कारण अटके हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विभाग ने इस समस्या का समाधान करने के लिए क्या प्रभावी व्यवस्था बनाई है।
फाइलों में प्रस्तावों की संख्या बढ़ना प्रगति का प्रमाण नहीं है। असली प्रगति तब होगी, जब काम जमीन पर पूरा होगा और जनता को उसका लाभ मिलेगा।
दूसरी तस्वीर: ट्रांसफॉर्मर के 999 प्रकरण अब भी लंबित
उपलब्ध विभागीय विवरण में 01 अप्रैल 2026 से 05 अक्टूबर 2026 तक ट्रांसफॉर्मर संबंधी कुल 1,84,624 प्रकरण प्राप्त होने और 1,83,625 प्रकरण बंद किए जाने का उल्लेख है। इसके बावजूद 999 प्रकरण लंबित दर्शाए गए हैं। इनमें 825 प्रकरण निर्धारित अवधि के भीतर तथा 174 प्रकरण निर्धारित अवधि से अधिक समय से लंबित बताए गए हैं।
यह आंकड़ा कासगंज स्टोर में सामग्री की कमी का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, लेकिन लंबित मामलों की निगरानी और समयबद्ध निस्तारण की जरूरत को अवश्य सामने रखता है।
जब विभाग बड़ी संख्या में प्रकरणों के निस्तारण का विवरण प्रस्तुत करता है, तो शेष लंबित मामलों पर भी उतनी ही गंभीरता से कार्रवाई होनी चाहिए। निस्तारण का प्रतिशत उन उपभोक्ताओं की परेशानी समाप्त नहीं करता, जिनका काम अभी भी अधूरा है।
अब अधिकारियों से सीधे सवाल—जवाबदेही तय होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?
1. स्टोर प्रबंधन से सवाल: कासगंज स्टोर में आवश्यक विद्युत सामग्री का वास्तविक स्टॉक कितना है और कमी दूर करने की समय सीमा क्या है?
2. आपूर्ति व्यवस्था से सवाल: यदि कार्यों की मांग पहले से थी, तो समय रहते पर्याप्त सामग्री की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
3. संबंधित अधिशासी अभियंता से सवाल: लंबित प्रस्तावों की समीक्षा कब की गई और कार्यों को पूरा कराने के लिए क्या कार्रवाई हुई?
4. उच्चाधिकारियों से सवाल: क्या कासगंज स्टोर में सामग्री की अनुपलब्धता और लंबित कार्यों की जांच कराई जाएगी?
5. विभागीय नेतृत्व से सवाल: क्या प्रत्येक लंबित प्रस्ताव के लिए निश्चित समयसीमा तय करके उसकी नियमित निगरानी की जाएगी?
6. जवाबदेही का सवाल: यदि जांच में प्रशासनिक देरी या लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित स्तर पर जिम्मेदारी निर्धारित की जाएगी या नहीं?
यूपीपीसीएल मीडिया की दो टूक—अब बहाने नहीं, हिसाब दीजिए!
कासगंज स्टोर में विद्युत सामग्री की वास्तविक उपलब्धता की तत्काल समीक्षा होनी चाहिए। सभी लंबित प्रस्तावों की सूची तैयार कर उनकी वर्तमान स्थिति, धनराशि जमा होने की स्थिति, सामग्री की मांग की तारीख और कार्य पूरा होने की संभावित तिथि स्पष्ट की जानी चाहिए।
जहां सामग्री की कमी वास्तविक बाधा है, वहां नियमानुसार आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। जहां प्रशासनिक देरी या लापरवाही सामने आती है, वहां जांच के बाद जवाबदेही तय की जाए। संबंधित अधिकारियों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि लंबित कार्य कब तक पूरे होंगे।
अंतिम सवाल: विभाग की व्यवस्था जनता के लिए है या जनता को व्यवस्था के चक्कर लगवाने के लिए?
उपभोक्ता से भुगतान में देरी हो तो विभागीय प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है। फिर जब विभाग के अपने कार्य आवश्यक सामग्री की कमी के कारण अटकते हैं, तो उसी तत्परता से समाधान क्यों नहीं दिखाई देता?
कासगंज का मामला अब केवल स्टोर में सामग्री की उपलब्धता का सवाल नहीं रह गया है। यह कार्ययोजना, आपूर्ति व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही का सवाल है।
जनता को आश्वासन नहीं, अपने काम का परिणाम चाहिए। प्रस्तावों की संख्या नहीं, पूरे हुए कार्यों का हिसाब चाहिए। और यदि सामग्री की कमी के कारण काम रुके हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कमी दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है और उसे कब तक पूरा किया जाएगा।
अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर जनता को एक बार फिर ‘स्टोर में सामान नहीं है’ सुनकर इंतजार करना पड़ेगा।
यूपीपीसीएल मीडिया का पक्ष: यह रिपोर्ट प्राप्त संदेशों और उपलब्ध विभागीय विवरण पर आधारित है। प्रस्तावों, धनराशि, स्टॉक तथा जिम्मेदारी से संबंधित दावों का स्वतंत्र सत्यापन अपेक्षित है। संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
अभी तक का अपडेट
खबर प्रकाशित
14 Oct, 10:19 am🚨 कासगंज स्टोर में ‘सामग्री का अकाल’, विभागीय सिस्टम बेहाल! पैसा जमा कराने में फुर्ती, काम कराने...
आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।
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