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बुलंदशहर बिजली विभाग में कथित ऑडियो से भूचाल!: MD मलाई खाएगा और हम देखते रहें?’ — आखिर विभाग में चल क्या रहा है?

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UPPCL MEDIA की पड़ताल | बुलंदशहर से लखनऊ तक जवाबदेही के सवाल

बुलंदशहर। बिजली विभाग में जनता को निर्बाध बिजली देने, उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनने और सरकारी धन का पारदर्शी इस्तेमाल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों के कंधों पर है, उन्हीं अधिकारियों से जुड़ा एक कथित वायरल ऑडियो अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ऑडियो को बुलंदशहर के मुख्य अभियंता संजीव कुमार और अधीक्षण अभियंता महेश कुमार अहिरवार से जोड़कर प्रसारित किया जा रहा है। इसमें कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों के संदर्भ में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा गया— “MD साला मलाई खाएगा और हम देखते रहें?”

यदि ऑडियो असली है और आवाजों की पहचान प्रमाणित होती है, तो यह केवल अमर्यादित भाषा का मामला नहीं रहेगा। यह जानने की जरूरत भी पैदा करेगा कि आखिर बातचीत की पृष्ठभूमि क्या थी, किस बात को लेकर नाराजगी थी और क्या इस पूरे प्रकरण के पीछे कोई विभागीय विवाद है?

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है— क्या निगम प्रबंधन इस कथित ऑडियो की निष्पक्ष जांच कराएगा, या मामला कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद फाइलों में दफन हो जाएगा?

मलाई किसकी, मलाई का हिसाब कौन देगा?

सरकारी बिजली विभाग कोई निजी जागीर नहीं है। यहां हर निर्णय नियमों, स्वीकृतियों और जनहित के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी को किसी निर्णय, भुगतान, टेंडर या विभागीय व्यवस्था पर आपत्ति है, तो उसके लिए आधिकारिक शिकायत, लिखित आपत्ति और जांच की व्यवस्था मौजूद है।

फिर कथित बातचीत में ऐसी भाषा इस्तेमाल करने की नौबत क्यों आई? क्या यह किसी सामान्य प्रशासनिक विवाद का हिस्सा है, किसी निर्णय के प्रति नाराजगी है या इसके पीछे कुछ और कहानी है?

इन सवालों का उत्तर अनुमान से नहीं, बल्कि ऑडियो की फॉरेंसिक जांच, संबंधित फाइलों और अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष से ही मिल सकता है।

UPPCL MEDIA का सीधा सवाल है— अगर बातचीत वास्तविक है, तो जिम्मेदार अधिकारी सामने आकर स्पष्ट करें कि आखिर पूरा मामला क्या है। सरकारी पद पर बैठकर नियमों की बात करने वालों को अपनी भाषा और अपने निर्णयों, दोनों के लिए जवाबदेह होना चाहिए।

राहुल शर्मा का निलंबन: कार्रवाई नियमों से हुई या फैसले पर उठेंगे सवाल?

इस प्रकरण के साथ सिकंदराबाद के तत्कालीन अधिशासी अभियंता राहुल शर्मा के निलंबन को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि उनके खिलाफ कथित रूप से भ्रामक या कूटरचित साक्ष्य निगम के समक्ष प्रस्तुत किए गए और उसके बाद निलंबन की कार्रवाई हुई। यह भी दावा किया गया है कि बाद में विकास सिंह बघेल को उस पद पर तैनात किया गया।

यदि ये आरोप गलत हैं, तो संबंधित दस्तावेजों से स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। यदि इनमें कोई तथ्य है, तो उसकी जांच भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए।

सवाल बेहद सीधा है— राहुल शर्मा के विरुद्ध कार्रवाई का आधार क्या था? शिकायत किसने की? कौन-से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए? क्या उनकी स्वतंत्र जांच हुई? क्या निलंबन के निर्णय में शामिल सभी अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की गई?

निलंबन कोई व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का औजार नहीं होना चाहिए। कार्रवाई साक्ष्य के आधार पर होनी चाहिए, और साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सवाल उठें तो जांच भी होनी चाहिए।

किसी अधिकारी को हटाने या किसी दूसरे अधिकारी की तैनाती को अपने आप षड्यंत्र नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि साक्ष्य गढ़ने या प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रमाण सामने आते हैं, तो मामला बेहद गंभीर होगा।

अपोलो कोटेड का स्वतंत्र फीडर: फाइल खुलेगी तो तस्वीर साफ होगी

अपोलो कोटेड के संयोजन के लिए स्वतंत्र फीडर बनाए जाने के मामले में भी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। इस संदर्भ में पूर्व निदेशक शेष कुमार बघेल और स्वदेश बघेल का नाम लिया गया है। आरोपों में विभागीय संसाधनों के दुरुपयोग और उपभोक्ता से अनुचित वसूली की आशंका जताई गई है।

इन आरोपों की सच्चाई का पता लगाने के लिए बयानबाजी नहीं, बल्कि फाइलों की जांच जरूरी है।

  • स्वतंत्र फीडर की मांग किसने की?

  • तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने दी?

  • प्रशासनिक और वित्तीय अनुमोदन किस स्तर पर हुआ?

  • निर्माण लागत किस आधार पर निर्धारित हुई?

  • क्या उपभोक्ता से ली गई राशि नियमों के अनुरूप थी?

  • क्या ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों के बीच किसी अनुचित लाभ का प्रमाण मौजूद है?

इन सवालों का जवाब संबंधित रिकॉर्ड, भुगतान विवरण और तकनीकी रिपोर्ट से मिल सकता है।

यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो दस्तावेज सामने रखे जाएं। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी तय हो। सरकारी बिजली तंत्र में किसी भी व्यक्ति को नियमों से ऊपर नहीं माना जाना चाहिए।

बिजनेस प्लान 2024-25: टेंडर की फाइलों का भी हो हिसाब

आरोप यह भी है कि बिजनेस प्लान 2024-25 के तहत ऐसे कार्यों के टेंडर किए गए, जिन्हें निगम स्तर से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त नहीं था।

यह आरोप सही है या गलत, इसका फैसला संबंधित स्वीकृति आदेश, टेंडर दस्तावेज, तकनीकी अनुमोदन और कार्यादेश की जांच से ही हो सकता है।

यदि किसी कार्य के लिए जरूरी मंजूरी नहीं थी, तो टेंडर किस आधार पर जारी हुआ? यदि मंजूरी थी, तो उसका आदेश कहां है? क्या कार्य स्वीकृत योजना में शामिल था? भुगतान हुआ तो किस प्रावधान के तहत?

सरकारी धन कोई लावारिस रकम नहीं है, जिसका हिसाब मांगने वाला कोई न हो। हर टेंडर का आधार होना चाहिए और हर भुगतान का दस्तावेजी हिसाब।

निगम प्रबंधन को चाहिए कि संबंधित टेंडरों का रिकॉर्ड जांच के लिए प्रस्तुत करे। यदि प्रक्रिया में अनियमितता मिले, तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।

प्रबंधन की चुप्पी पर भी उठेंगे सवाल

किसी विभाग में कथित ऑडियो सामने आए, निलंबन की प्रक्रिया पर सवाल उठें, औद्योगिक कनेक्शन और टेंडर को लेकर आरोप लगें— और फिर भी संबंधित रिकॉर्ड की जांच या आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने न आए, तो जवाबदेही का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, अभी यह प्रमाणित नहीं है कि निगम प्रबंधन ने इस मामले में कोई जांच नहीं कराई है। इसलिए प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या शिकायत प्राप्त हुई है, क्या जांच शुरू हुई है और क्या संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया है।

यदि जांच पहले से चल रही है, तो उसकी स्थिति और निर्धारित प्रक्रिया की जानकारी सामने आनी चाहिए। यदि जांच नहीं हुई है, तो गंभीर आरोपों के मद्देनजर उचित कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए।

किसी अधिकारी का पद जांच से छूट का प्रमाणपत्र नहीं है। इसी तरह, वायरल ऑडियो में नाम आने भर से कोई व्यक्ति दोषी भी नहीं हो जाता। फैसला प्रमाण करेंगे— और प्रमाणों की जांच निष्पक्ष होनी चाहिए।

UPPCL प्रबंधन से सीधे सवाल

  1. क्या कथित वायरल ऑडियो की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी?

  2. राहुल शर्मा के निलंबन में प्रस्तुत साक्ष्यों और निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा होगी?

  3. अपोलो कोटेड के स्वतंत्र फीडर की स्वीकृति, निर्माण लागत और भुगतान का रिकॉर्ड जांचा जाएगा?

  4. बिजनेस प्लान 2024-25 के विवादित टेंडरों के अनुमोदन और भुगतान की जांच होगी?

  5. क्या संबंधित अधिकारियों से लिखित जवाब लेकर जांच के निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी?

अंतिम सवाल: विभाग नियमों से चलेगा या रसूख से?

बिजली विभाग जनता की सेवा के लिए है, किसी अधिकारी की निजी प्रतिष्ठा या किसी समूह के हितों की रक्षा के लिए नहीं। उपभोक्ता बिजली बिल भरता है और बदले में पारदर्शी व्यवस्था की अपेक्षा करता है। उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके पैसे से चलने वाला तंत्र नियमों के अनुसार काम कर रहा है या नहीं।

कथित ऑडियो की प्रामाणिकता की जांच हो। निलंबन से जुड़े दस्तावेज परखे जाएं। स्वतंत्र फीडर और टेंडरों की स्वीकृतियां जांची जाएं। जिन अधिकारियों के नाम आरोपों में आए हैं, उनका पक्ष भी दर्ज किया जाए।

UPPCL MEDIA की मांग स्पष्ट है— आरोपों को न दबाया जाए, न बिना जांच दोष सिद्ध माना जाए। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता प्रमाणित होती है, तो कार्रवाई पद देखकर नहीं, साक्ष्य और नियम देखकर हो।

आखिरकार, सरकारी विभाग में सबसे बड़ी कुर्सी भी कानून से बड़ी नहीं होती। जनता को बयान नहीं, जवाब चाहिए; आरोप नहीं, जांच चाहिए; और आश्वासन नहीं, पारदर्शी कार्रवाई चाहिए।

अब देखना यह है कि बुलंदशहर के इस कथित ऑडियो प्रकरण पर निगम प्रबंधन तथ्य सामने लाता है या सवाल जवाब की प्रतीक्षा में ही रह जाते हैं।

खबर से आगे, जवाब तक

यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट

खबर प्रकाशित

9 Oct, 11:04 am

UPPCL MEDIA की पड़ताल | बुलंदशहर से लखनऊ तक जवाबदेही के सवाल बुलंदशहर। बिजली विभाग में जनता को निर्बाध बिजल...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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