आशीष गोयल के कार्यकाल पर उठे सवाल, अब रणवीर प्रसाद के सामने जवाबदेही की बड़ी चुनौती
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग में 21 सितंबर 2026 का प्रशासनिक फेरबदल सिर्फ कुर्सी बदलने की कवायद नहीं माना जा सकता। अपर मुख्य सचिव ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत तथा प्रमुख विद्युत निगमों के अध्यक्ष रहे डॉ. आशीष कुमार गोयल को अब श्रम एवं सेवायोजन विभाग भेज दिया गया है, जबकि रणवीर प्रसाद को ऊर्जा विभाग के साथ UPPCL, UPPTCL, UPRVUNL और UPPower/SLDC से जुड़ी शीर्ष जिम्मेदारियां दी गई हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ चेहरा बदलने से ऊर्जा व्यवस्था की वे समस्याएं भी बदल जाएंगी, जिन पर लगातार सवाल उठते रहे हैं?
मंत्री की नाराजगी ने खोल दी थी व्यवस्था की परत
जून 2026 में ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा की ओर से UPPCL के तत्कालीन चेयरमैन आशीष गोयल को भेजे गए पत्र ने विभाग के भीतर निर्णय-प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल सार्वजनिक कर दिए थे।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मंत्री ने 29 मई 2026 को 10 प्रतिशत FPPAS की वसूली संबंधी निर्देश का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया था कि इतने व्यापक प्रभाव वाले निर्णय की जानकारी उन्हें पहले क्यों नहीं दी गई। मंत्री ने यह भी कहा था कि उन्हें इस विषय की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली।
यानी सवाल केवल सरचार्ज का नहीं था।
सवाल था—ऊर्जा विभाग में निर्णय कौन ले रहा था, किसे जानकारी थी और जवाबदेही किसकी थी?
यही वह बिंदु है जहां तत्कालीन शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका पर सार्वजनिक जांच और स्पष्टीकरण की जरूरत पैदा होती है।
गोयल के कार्यकाल पर अब जवाबदेही का सवाल
यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रदेश की बिजली व्यवस्था की प्रत्येक समस्या के लिए किसी एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। बिजली व्यवस्था पर मांग, उत्पादन, कोयला, पारेषण, वितरण नेटवर्क और तकनीकी खराबियों सहित अनेक कारकों का प्रभाव पड़ता है।
लेकिन जब किसी अधिकारी के पास ऊर्जा विभाग के साथ प्रमुख विद्युत संस्थानों की शीर्ष जिम्मेदारी हो, तब निर्णय-प्रक्रिया और परिणामों की प्रशासनिक जवाबदेही से उस पद को अलग भी नहीं किया जा सकता।
इसीलिए गोयल के कार्यकाल को लेकर अब ये सवाल पूछे जाने चाहिए—
- क्या विभाग और निगमों के बीच समन्वय प्रभावी था?
- क्या महत्वपूर्ण उपभोक्ता-प्रभावी निर्णयों में पर्याप्त पारदर्शिता रही?
- क्या तकनीकी विशेषज्ञता को प्रशासनिक निर्णयों में पर्याप्त महत्व मिला?
- क्या अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती तथा स्थानांतरण की व्यवस्था वास्तव में स्वतंत्र और पारदर्शी रही?
इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड और दस्तावेजों से आने चाहिए, आरोपों से नहीं।
अदालत का पुराना फैसला भी देता है चेतावनी
25 जनवरी 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि ऊर्जा सचिव और UPPCL के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर के पद अलग-अलग अधिकारियों के पास होने चाहिए। अदालत ने इसके पीछे स्वतंत्र निगरानी और प्राकृतिक न्याय की आवश्यकता को महत्वपूर्ण माना था।
यह पुराना फैसला आज की नियुक्ति पर स्वतः कोई कानूनी निषेध नहीं लगाता, लेकिन उसका संस्थागत सवाल आज भी महत्वपूर्ण है—
जिसके पास निर्णय लेने की शक्ति है, उसकी निगरानी कौन करेगा?
यही सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब विभाग और उसके प्रमुख निगमों की जिम्मेदारियां एक ही शीर्ष प्रशासनिक व्यवस्था में केंद्रित हों।
बिजली उपभोक्ता आखिर किससे सवाल करे?
ऊर्जा विभाग की असली परीक्षा सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि उपभोक्ता के घर में होती है।
- वहां सवाल सीधा है—
- बिजली कब आएगी?
- बिल सही क्यों नहीं है?
- शिकायत का समाधान कब होगा?
- लो-वोल्टेज और ट्रिपिंग की समस्या कब खत्म होगी?
और यदि कोई बड़ा निर्णय उपभोक्ता की जेब पर असर डालता है तो उसकी जानकारी और जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी?
यही कारण है कि शीर्ष प्रशासनिक बदलाव को केवल “एक अधिकारी गया, दूसरा आ गया” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
अब रणवीर प्रसाद के सामने असली परीक्षा
रणवीर प्रसाद को ऊर्जा विभाग और प्रमुख विद्युत संस्थानों की कमान ऐसे समय मिली है जब विभाग के सामने प्रशासनिक समन्वय, विशेषज्ञता, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवाल पहले से मौजूद हैं।
अब नई व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या पिछली व्यवस्था से उठे सवालों की समीक्षा होगी या केवल फाइलों पर नए हस्ताक्षर होंगे?
जरूरत इस बात की है कि महत्वपूर्ण निर्णयों की प्रक्रिया स्पष्ट हो, तकनीकी विशेषज्ञता को उचित स्थान मिले, विभागीय समन्वय मजबूत हो और उपभोक्ता-प्रभावी फैसलों में पारदर्शिता दिखाई दे।
‘वर्टिकल सिस्टम’ भी सवालों के घेरे में
ऊर्जा विभाग में लागू प्रशासनिक संरचनाओं और वर्टिकल व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच चर्चा होती रही है। यदि किसी व्यवस्था से निर्णय प्रक्रिया तेज होने के बजाय जिम्मेदारी की रेखाएं अस्पष्ट होती हैं, तो उसकी समीक्षा आवश्यक है।
वर्टिकल व्यवस्था का मूल्यांकन नारों से नहीं, परिणामों से होना चाहिए।
- किसकी जिम्मेदारी क्या है?
- किसके पास अंतिम निर्णय की शक्ति है?
- गलती होने पर जवाबदेही किसकी होगी?
- और उपभोक्ता की शिकायत आखिर किस स्तर पर सुनी जाएगी?
इन सवालों का जवाब जितना स्पष्ट होगा, व्यवस्था उतनी ही जवाबदेह मानी जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल—कुर्सी बदली या व्यवस्था?
आशीष गोयल को ऊर्जा विभाग से हटाकर श्रम एवं सेवायोजन विभाग भेजे जाने के बाद प्रशासनिक फेरबदल तो हो गया, लेकिन अब असली सवाल इससे आगे का है।
- क्या इस बदलाव के साथ ऊर्जा विभाग में निर्णय लेने की शैली भी बदलेगी?
- क्या विभागीय नेतृत्व और निगमों के बीच बेहतर संवाद स्थापित होगा?
- क्या तकनीकी विशेषज्ञता को प्राथमिकता मिलेगी?
- क्या बड़े फैसलों में पारदर्शिता बढ़ेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या आम बिजली उपभोक्ता को वास्तव में राहत मिलेगी?
यूपीपीसीएल मीडिया का सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का सवाल है।
आशीष गोयल के कार्यकाल से जुड़े जिन निर्णयों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठे हैं, उनकी तथ्यात्मक समीक्षा होनी चाहिए। यदि कहीं प्रशासनिक चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय हो और यदि निर्णय नियमों के अनुरूप थे तो शासन को उसका स्पष्ट पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए।
क्योंकि कुर्सी बदलने से सवाल खत्म नहीं होते।
सवाल तब खत्म होते हैं, जब जवाब सामने आते हैं।
और ऊर्जा विभाग के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
“चेहरा बदला है या व्यवस्था भी बदलेगी?”
UPPCL MEDIA — सवाल व्यवस्था से, जवाबदेही जनता के प्रति।
यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट
खबर प्रकाशित
21 Sep, 10:04 pmआशीष गोयल के कार्यकाल पर उठे सवाल, अब रणवीर प्रसाद के सामने जवाबदेही की बड़ी चुनौती लखनऊ। उत्तर प्रदेश के ऊ...
आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।
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