6000 KVA संयोजन प्रकरण में राहुल शर्मा के निलंबन के बाद UPPCL MEDIA ने उठाए गंभीर सवाल, अंतिम स्वीकृति के अधिकार, फाइल मूवमेंट, निवेश मित्र पोर्टल और उच्च अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग
अधिशासी अभियंता पर कार्रवाई, लेकिन अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता की भूमिका पर चुप्पी क्यों? UPPCL MEDIA के सवालों से विभाग की जवाबदेही पर उठे गंभीर प्रश्न
बुलंदशहर/मेरठ।
6000 KVA संयोजन प्रकरण को लेकर UPPCL MEDIA की दस्तावेजी पड़ताल प्रसारित हुए 18 घंटे से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक विभाग की ओर से ऐसा कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि पूरे प्रकरण में वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब दस्तावेजों के आधार पर अधिकार-क्षेत्र, तकनीकी स्वीकृति और फाइल की आवाजाही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो विभाग की चुप्पी आखिर किसके हित में है?
- क्या विभागीय मशीनरी अधीक्षण अभियंता को बचाने की कोशिश कर रही है?
- क्या मुख्य अभियंता की भूमिका पर पर्दा डालने का प्रयास हो रहा है?
- और क्या ऐसे अधिकारी को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, जिसके अधिकार-क्षेत्र की वास्तविक सीमा की जांच किए बिना ही कार्रवाई कर दी गई?
- इन सवालों का जवाब अब विभाग को देना ही होगा।
18 घंटे बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
UPPCL MEDIA ने जब इस पूरे प्रकरण में 6000 KVA संयोजन, भार स्वीकृति, तकनीकी अनुमोदन, निवेश मित्र पोर्टल और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए, तो उम्मीद थी कि विभाग तत्काल पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगा।
लेकिन 18 घंटे बीतने के बाद भी कार्रवाई के नाम पर खामोशी दिखाई दे रही है।
- न तो यह स्पष्ट किया गया कि 6000 KVA के मामले में सक्षम स्वीकृति प्राधिकारी कौन था।
- न यह बताया गया कि फाइल किस अधिकारी के पास कितने समय तक लंबित रही।
- न निवेश मित्र पोर्टल के रिकॉर्ड को सार्वजनिक जांच का विषय बनाया गया।
- न ही यह स्पष्ट किया गया कि अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता स्तर पर फाइल की क्या भूमिका रही।
तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या विभाग जवाब देने से बच रहा है या किसी खास अधिकारी को बचाने के लिए समय काट रहा है?
कार्रवाई नीचे, सवाल ऊपर वालों से क्यों नहीं?
पूरे मामले में अधिशासी अभियंता राहुल शर्मा के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई हो चुकी है।
लेकिन यदि 6000 KVA जैसे मामले में अंतिम भार स्वीकृति और तकनीकी निर्णय उच्च स्तर से संबंधित थे, तो फिर यह जानना जरूरी है कि उच्च अधिकारियों की भूमिका की उसी गंभीरता से जांच क्यों नहीं दिखाई दे रही?
- एक फाइल में कई स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं।
- फाइल नीचे से ऊपर जाती है।
- तकनीकी परीक्षण होता है।
- प्राक्कलन तैयार होता है।
- अनुमोदन की प्रक्रिया चलती है।
- निर्णय उच्च स्तर पर होता है।
ऐसे में केवल अंतिम परिणाम के आधार पर एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहरा देना पर्याप्त नहीं हो सकता।
फाइल की पूरी टाइमलाइन निकालिए—किसके पास कब थी, किसने क्या किया और किसने क्या नहीं किया।
यही असली जांच होगी।
अधीक्षण अभियंता को बचाने की कोशिश क्यों?
इस मामले में सबसे ज्यादा सवाल अधीक्षण अभियंता स्तर की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं।
यदि दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि 6000 KVA के भार से संबंधित निर्णय और तकनीकी अनुमोदन उच्च अधिकारी के स्तर से जुड़े थे, तो विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि उस स्तर की जवाबदेही क्या तय की गई?
- क्या अधीक्षण अभियंता से पूछताछ हुई?
- क्या उनके स्तर पर फाइल कितने समय रही, इसकी जांच हुई?
- क्या उनके निर्णयों और निर्देशों की समीक्षा हुई?
- क्या उनके द्वारा जारी पत्रों और तकनीकी टिप्पणियों का परीक्षण हुआ?
- यदि यह सब हुआ है तो विभाग सामने रखे।
यदि नहीं हुआ है तो सवाल और गंभीर हो जाता है—
क्या अधीक्षण अभियंता को बचाने के लिए जांच का दायरा सीमित रखा गया?
UPPCL MEDIA किसी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं कर रहा।
लेकिन जिस अधिकारी की भूमिका सवालों में है, उसकी जांच न होना भी अपने आप में सवाल है।
मुख्य अभियंता की भूमिका पर भी चुप्पी क्यों?
मामला केवल अधीक्षण अभियंता तक सीमित नहीं है।
मुख्य अभियंता स्तर की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में जांच का विषय बनती है।
यदि तकनीकी और प्रशासनिक निर्णय उच्च स्तर पर लिए गए, तो यह पता लगाना जरूरी है कि मुख्य अभियंता स्तर पर क्या निर्णय हुए।
- कौन-सा निर्देश दिया गया?
- किस आधार पर दिया गया?
- क्या वैकल्पिक विद्युत व्यवस्था का परीक्षण हुआ?
- क्या स्वतंत्र फीडर और मौजूदा बे के विकल्पों की लागत और तकनीकी उपयोगिता की तुलना की गई?
- क्या संबंधित पत्राचार मुख्य अभियंता के संज्ञान में था?
और सबसे महत्वपूर्ण—
यदि उच्च स्तर के निर्णयों का भी इस मामले के परिणाम पर प्रभाव था, तो कार्रवाई केवल अधिशासी अभियंता तक क्यों सीमित रही?
क्या निर्दोष को बलि का बकरा बनाया जा रहा है?
यह इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील सवाल है।
किसी अधिकारी का निलंबन यह साबित नहीं करता कि वह दोषी है।
निलंबन जांच की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन यदि बाद की जांच में यह सामने आता है कि संबंधित अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध प्रक्रिया के अनुसार फाइल आगे बढ़ाई थी और अंतिम निर्णय किसी उच्च अधिकारी के स्तर पर होना था, तो फिर सवाल उठेगा कि—
क्या आसान निशाना देखकर कार्रवाई कर दी गई?
क्या नीचे के अधिकारी को जिम्मेदार बनाकर ऊपर बैठे अधिकारियों की भूमिका को नजरअंदाज किया गया?
क्या एक अधिकारी को बलि का बकरा बनाकर पूरी फाइल बंद करने की कोशिश हो रही है?
इन सवालों का जवाब विभाग को रिकॉर्ड के आधार पर देना चाहिए।
6000 KVA मामला कोई छोटी फाइल नहीं
यह कोई मामूली घरेलू कनेक्शन का मामला नहीं है।
6000 KVA का संयोजन तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मामला है।
ऐसे मामले में—
- भार स्वीकृति,
- तकनीकी अनुमोदन,
- टीएफआर,
- फीडर व्यवस्था,
- बे की उपलब्धता,
- प्राक्कलन,
- निवेश मित्र पोर्टल,
- फाइल मूवमेंट
जैसे प्रत्येक चरण की अपनी जिम्मेदारी होती है।
फिर यह कैसे संभव है कि पूरी प्रक्रिया की जांच किए बिना कार्रवाई का केंद्र केवल एक अधिकारी बन जाए?
निवेश मित्र पोर्टल की जांच हुई या सिर्फ आरोप लगा दिया गया?
इस मामले में निवेश मित्र पोर्टल की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
यदि आवेदन के रिजेक्शन अथवा पोर्टल अपडेट को लेकर अलग-अलग अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच पत्राचार हुआ था, तो विभाग को पोर्टल का डिजिटल ऑडिट ट्रेल निकालना चाहिए।
- किस यूजर ने आवेदन खोला?
- किस यूजर ने बदलाव किया?
- कब किया?
- किस कारण से किया?
- रिजेक्शन किस स्तर से हुआ?
यदि पोर्टल की गलती या किसी अन्य कर्मचारी की कार्रवाई के कारण आवेदन प्रभावित हुआ था, तो उसका उत्तरदायित्व भी तय होना चाहिए।
सिर्फ अधिशासी अभियंता को जिम्मेदार ठहराना और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच न करना—क्या यह पूरी जांच है?
ठेकेदार की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
मामले में ठेकेदार से कथित मिलीभगत के आरोप भी सामने आए हैं।
UPPCL MEDIA इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता।
लेकिन यदि आरोप लगाए गए हैं तो जांच होनी चाहिए।
टेंडर फाइल खोलिए।
एस्टीमेट देखिए।
तकनीकी स्वीकृति देखिए।
कार्यादेश देखिए।
भुगतान रिकॉर्ड देखिए।
साइट निरीक्षण रिपोर्ट देखिए।
और यह भी देखिए कि किस विकल्प से विभाग और उपभोक्ता पर कितना वित्तीय भार पड़ता।
यदि सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है तो आरोप स्वतः कमजोर हो जाएंगे।
लेकिन यदि कोई अनियमितता है तो कार्रवाई केवल एक अधिकारी तक सीमित क्यों हो?
विभाग की चुप्पी अब खुद सवाल बन गई है
18 घंटे पहले UPPCL MEDIA ने सवाल उठाए थे।
अब विभाग के पास दो रास्ते हैं।
पहला—चुप रहे और सवालों को दबने का इंतजार करे।
दूसरा—पूरी फाइल खोले और सार्वजनिक रूप से बताए कि जिम्मेदारी किसकी थी।
दूसरा रास्ता कठिन है, लेकिन यही प्रशासनिक पारदर्शिता का रास्ता है।
क्योंकि आज सवाल राहुल शर्मा के निलंबन का है।
कल सवाल किसी दूसरे अधिकारी का भी हो सकता है।
यदि व्यवस्था में यह संदेश चला गया कि “नीचे वाले पर कार्रवाई करो और ऊपर वालों से सवाल मत पूछो”, तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं रहेगा।
यह पूरे विभागीय सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन जाएगा।
UPPCL MEDIA का सीधा सवाल
1. 6000 KVA भार की अंतिम स्वीकृति का सक्षम अधिकारी कौन था?
2. उस सक्षम अधिकारी की भूमिका की जांच क्यों स्पष्ट नहीं की जा रही?
3. अधीक्षण अभियंता के स्तर पर फाइल कितने समय रही?
4. मुख्य अभियंता स्तर पर क्या निर्णय लिए गए?
5. निवेश मित्र पोर्टल का डिजिटल लॉग क्यों नहीं जांचा गया?
6. फाइल की पूरी मूवमेंट टाइमलाइन क्यों सामने नहीं लाई गई?
7. स्वतंत्र फीडर बनाम मौजूदा बे की तकनीकी और वित्तीय तुलना किसने की?
8. ठेकेदार की भूमिका की स्वतंत्र जांच हुई या नहीं?
9. यदि कई स्तर के अधिकारी प्रक्रिया में शामिल थे तो कार्रवाई केवल एक अधिकारी तक क्यों सीमित रही?
10. क्या विभाग निष्पक्ष जांच करेगा या एक निलंबन के बाद फाइल बंद कर देगा?
अब समय जवाब का है
विभागीय कार्रवाई किसी अधिकारी को बचाने या किसी अधिकारी को फंसाने का माध्यम नहीं होनी चाहिए।
जिसकी गलती है—उसकी जवाबदेही तय हो।
जिसकी भूमिका नहीं है—उसे अनावश्यक रूप से दोषी न बनाया जाए।
और जिसकी भूमिका है—चाहे वह कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो—उससे सवाल जरूर पूछा जाए।
UPPCL MEDIA का सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, पूरे सिस्टम से है।
अगर राहुल शर्मा ने गलती की है तो जांच में वह सामने आए और कार्रवाई हो।
लेकिन यदि जांच यह बताती है कि उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर के निर्णयों और देरी का भार भी उनके सिर डाल दिया गया, तो फिर जिम्मेदारी तय करने वालों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
18 घंटे की खामोशी अब बहुत कुछ कह रही है।
क्या विभाग अधीक्षण अभियंता को बचा रहा है?
क्या मुख्य अभियंता की भूमिका पर पर्दा डाला जा रहा है?
क्या एक अधीनस्थ अधिकारी को बलि का बकरा बनाकर पूरी फाइल बंद करने की कोशिश हो रही है?
इन सवालों का जवाब अभी बाकी है।
और जब तक जवाब नहीं मिलता, 6000 KVA संयोजन प्रकरण में उठे सवाल खत्म नहीं होंगे।
UPPCL MEDIA की मांग
- पूरी फाइल की स्वतंत्र जांच हो।
- फाइल मूवमेंट और निवेश मित्र पोर्टल लॉग की जांच हो।
- अधीक्षण अभियंता से लेकर मुख्य अभियंता स्तर तक प्रत्येक अधिकारी की भूमिका तय हो।
- ठेकेदार और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जाए।
- और यदि किसी निर्दोष अधिकारी को गलत तरीके से कार्रवाई का शिकार बनाया गया है, तो उसे न्याय मिले।
- क्योंकि विभागीय अनुशासन का मतलब यह नहीं कि सबसे आसान अधिकारी को पकड़कर मामला खत्म कर दिया जाए।
असल कसौटी यही है—दोषी कितना बड़ा है, यह नहीं; दोषी कौन है, यह तय होना चाहिए।
UPPCL MEDIA संबंधित सभी अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।
यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट
खबर प्रकाशित
21 Aug, 11:09 am6000 KVA संयोजन प्रकरण में राहुल शर्मा के निलंबन के बाद UPPCL MEDIA ने उठाए गंभीर सवाल, अंतिम स्वीकृति के...
आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।
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