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6000 KVA संयोजन विवाद: अधिकार किसी और का कार्रवाई किसी और पर? निलंबन ने खड़े किए बड़े सवाल

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6000 KVA संयोजन विवाद - क्या जिस अधिकारी के पास स्वीकृति का अधिकार था, उसकी जवाबदेही तय हुई? सिकंदराबाद में अधिशासी अभियंता राहुल शर्मा पर कार्रवाई, लेकिन 6000 KVA की स्वीकृति के अधिकार वाले स्तर की भूमिका पर सवाल | UPPCL MEDIA की दस्तावेजी पड़ताल

बुलंदशहर/मेरठ।

पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के सिकंदराबाद विद्युत वितरण खंड के अधिशासी अभियंता राहुल शर्मा के निलंबन ने अब एक ऐसे सवाल को जन्म दे दिया है, जिसे विभाग शायद नजरअंदाज नहीं कर सकता—क्या 6000 KVA संयोजन प्रकरण में वास्तविक जिम्मेदारी उसी अधिकारी पर डाली गई, जिसके पास अंतिम भार स्वीकृति का अधिकार ही नहीं था?

12 अगस्त 2026 के निलंबन आदेश में राहुल शर्मा पर कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही, अनावश्यक क्वेरी, मनमाना आचरण, संयोजन में विलंब, आवेदक के उत्पीड़न तथा निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन निरस्त होने जैसे आरोप लगाए गए हैं।

लेकिन उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों और भार स्वीकृति से संबंधित आदेशों को साथ रखकर देखने पर मामला इतना सीधा नहीं दिखाई देता।

6000 KVA का भार था। उपलब्ध आदेश में 4000 KVA से अधिक भार के मामलों में अधीक्षण अभियंता स्तर की स्वीकृति का प्रावधान दिखाई देता है। फिर सवाल सीधा है—जिस स्तर पर स्वीकृति का अधिकार था, उस स्तर की जवाबदेही कहां है?

यहीं से निलंबन की पूरी कार्रवाई कठघरे में खड़ी होती दिखाई देती है।


6000 KVA का मामला और अधिकार-क्षेत्र का सबसे बड़ा सवाल

मैसर्स अपोलो कोटेड प्रोडक्ट्स यूनिट-2 के 6000 किलोवाट/6000 KVA संयोजन से जुड़े प्रकरण में निवेश मित्र पोर्टल के माध्यम से आवेदन हुआ।

मामले में टीएफआर, तकनीकी परीक्षण, ट्रांसमिशन एवं डिस्ट्रीब्यूशन व्यवस्था तथा वैकल्पिक विद्युत स्रोत को लेकर जुलाई 2026 में लगातार पत्राचार हुआ।

9 जुलाई से लेकर 30 जुलाई तक अलग-अलग तिथियों में हुए पत्राचार से यह संकेत मिलता है कि मामला एक दिन में निपटने वाला साधारण संयोजन नहीं था, बल्कि इसमें तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर लगातार प्रक्रिया चल रही थी।

इसके बावजूद अंतिम कार्रवाई का सबसे बड़ा भार अधिशासी अभियंता पर डाल दिया गया।

यही सवाल है—क्या विभाग ने फाइल की पूरी यात्रा देखी या केवल अंतिम परिणाम देखकर एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहरा दिया?


अधिकार किसी और का, निलंबन किसी और का?

उपलब्ध भार स्वीकृति संबंधी आदेश में 3600 KW अर्थात लगभग 4000 KVA से अधिक भार के मामलों में अधीक्षण अभियंता (वितरण) स्तर की भूमिका निर्धारित दिखाई देती है।

ऐसे में 6000 KVA के मामले में सबसे महत्वपूर्ण जांच यह होनी चाहिए कि—

  • भार स्वीकृति का वास्तविक सक्षम अधिकारी कौन था?

  • तकनीकी अनुमोदन किस स्तर से होना था?

  • प्राक्कलन किस अधिकारी को भेजा गया?

  • फाइल किस-किस स्तर पर कितने समय तक लंबित रही?

  • निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन किस स्तर से और किस कारण से प्रभावित हुआ?

  • और अंततः विलंब की जिम्मेदारी किसकी बनती थी?

यदि रिकॉर्ड यह बताता है कि अंतिम स्वीकृति का अधिकार अधीक्षण अभियंता स्तर पर था, तो केवल अधिशासी अभियंता को कार्रवाई का केंद्र बनाना प्रथमदृष्टया अधूरी जवाबदेही जैसा प्रतीत होता है।

यह किसी अधिकारी को निर्दोष घोषित करने का मामला नहीं है।

यह उससे भी बड़ा सवाल है—जिम्मेदारी तय करने का पैमाना क्या था?


निलंबन आदेश के बिंदु-17 ने बढ़ाई उलझन

निलंबन से जुड़े दस्तावेज में अधीक्षण अभियंता, विद्युत वितरण मंडल-द्वितीय, बुलंदशहर की ओर से पत्र संख्या 2820 दिनांक 10 अगस्त 2026 का उल्लेख है।

इसमें अधिशासी अभियंता, विद्युत वितरण खंड-प्रथम, सिकंदराबाद द्वारा पत्र संख्या 2943 दिनांक 7 अगस्त 2026 से भेजे गए प्राक्कलन और तकनीकी अनुमोदन से संबंधित स्थिति का उल्लेख किया गया है।

यहीं दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर सबसे गंभीर प्रश्न पैदा होता है।

यदि अधिशासी अभियंता ने प्राक्कलन को तकनीकी अनुमोदन के लिए सक्षम उच्च अधिकारी के पास भेजा था, तो फिर तकनीकी अनुमोदन की पूरी प्रक्रिया और उसमें हुए विलंब की जिम्मेदारी केवल उसी अधिकारी पर कैसे तय हो सकती है जिसने फाइल आगे बढ़ाई?

यह सवाल विभागीय जांच में स्पष्ट होना चाहिए।

क्योंकि किसी फाइल को उच्च अधिकारी के स्तर पर भेजना और उसी फाइल की अंतिम तकनीकी/भार स्वीकृति देना—दो अलग-अलग प्रशासनिक जिम्मेदारियां हैं।


क्या ‘फाइल आगे भेजने वाला’ ही दोषी हो गया?

सरकारी व्यवस्था में अधिकारी की जिम्मेदारी उसके अधिकार-क्षेत्र से निर्धारित होती है।

यदि किसी अधिकारी के पास अंतिम निर्णय का अधिकार नहीं है, तो उसके स्तर पर हुई कार्रवाई और अंतिम निर्णय के बीच अंतर करना जरूरी है।

इसीलिए इस मामले में यह जांच अनिवार्य है कि राहुल शर्मा की भूमिका वास्तव में क्या थी और उनके अधिकार की सीमा कहां समाप्त होती थी।

यदि उन्होंने प्राक्कलन आगे भेजा, तकनीकी विकल्पों पर पत्राचार किया और उच्च अधिकारियों को लगातार स्थिति से अवगत कराया, तो केवल यह कह देना कि संयोजन में विलंब हुआ—पूरी जिम्मेदारी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

देरी हुई तो किस स्तर पर हुई?

# किसके पास फाइल रुकी?

# किस अधिकारी को निर्णय लेना था?

# किस अधिकारी ने निर्णय नहीं लिया?

इन सवालों के जवाब के बिना कार्रवाई अधूरी जांच का परिणाम मानी जा सकती है।


निवेश मित्र पोर्टल: असली दोषी कौन?

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन के रिजेक्ट होने से भी जुड़ा है।

राहुल शर्मा की ओर से दावा किया गया है कि किसी अन्य संयोजन को बाबू स्तर से रिजेक्ट किए जाने के बाद पोर्टल अपडेट होने पर संबंधित आवेदन भी रिजेक्ट दिखाई देने लगा और इसकी जानकारी अधिकारियों को पत्रों तथा व्हाट्सऐप के माध्यम से दी जाती रही।

यदि यह दावा रिकॉर्ड से सही साबित होता है तो जांच का फोकस केवल अधिशासी अभियंता पर नहीं रहना चाहिए।

पोर्टल लॉग की जांच होनी चाहिए।

पता लगाया जाना चाहिए कि—

  1. आवेदन किस यूजर आईडी से खोला गया?

  2. किस स्तर से रिजेक्ट किया गया?

  3. रिजेक्शन का कारण क्या दर्ज था?

  4. पोर्टल पर बदलाव कब हुआ?

  5. किस कर्मचारी/अधिकारी ने अपडेट किया?

  6. संबंधित अधिकारी ने सूचना मिलने के बाद क्या कार्रवाई की?

यदि तकनीकी या ऑपरेशनल गलती हुई थी तो उसका ठीकरा केवल अधिशासी अभियंता के सिर फोड़ना प्रशासनिक रूप से गंभीर सवाल पैदा करता है।


स्वतंत्र फीडर या मौजूदा बे—किसे फायदा?

मामले में स्वतंत्र फीडर/विद्युत व्यवस्था बनाम मौजूदा बे से आपूर्ति देने की तकनीकी संभावना को लेकर भी विवाद सामने आया है।

राहुल शर्मा की ओर से दावा किया गया है कि कम लागत वाले वैकल्पिक तकनीकी विकल्प पर विचार किया जा सकता था।

दूसरी ओर स्वतंत्र व्यवस्था तैयार कराने पर अधिक कार्य और अधिक लागत की संभावना का आरोप लगाया गया है।

यहां UPPCL MEDIA किसी अधिकारी या ठेकेदार को दोषी घोषित नहीं कर रहा है।

लेकिन यह जांच का विषय जरूर है।

यदि स्वतंत्र फीडर की जरूरत थी तो उसका तकनीकी औचित्य क्या था?

उसकी अनुमानित लागत कितनी थी?

मौजूदा बे से आपूर्ति देने की लागत कितनी थी?

दोनों विकल्पों की तुलनात्मक रिपोर्ट किसने बनाई?

टीएफआर में क्या विकल्प दर्ज थे?

और यदि किसी ठेकेदार को काम मिलना था तो उसका टेंडर, अनुमान, कार्यादेश और भुगतान प्रक्रिया क्या थी?

इन दस्तावेजों की जांच से ही पता चलेगा कि निर्णय तकनीकी जरूरत था या किसी को अतिरिक्त काम देने का रास्ता।


ठेकेदार से मिलीभगत के आरोप: जांच हो, वरना सवाल और गहरे होंगे

मामले में मुख्य अभियंता वितरण बुलंदशहर संजीव कुमार और अधीक्षण अभियंता महेश कुमार अहीरवार की भूमिका को लेकर ठेकेदार से कथित मिलीभगत और आर्थिक हित साधने के आरोप लगाए गए हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

लेकिन आरोप गंभीर हैं, इसलिए उन्हें केवल बयान कहकर खारिज भी नहीं किया जा सकता।

टेंडर फाइल, एस्टीमेट, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, साइट रिपोर्ट, भुगतान और ठेकेदार के पिछले कार्यों की जांच होनी चाहिए।

अगर सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है तो संबंधित अधिकारियों को जांच में क्लीन चिट मिलनी चाहिए।

और यदि कहीं आर्थिक हितों का टकराव सामने आता है तो कार्रवाई केवल अधिशासी अभियंता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।


जातीय भेदभाव के आरोप: विभाग को देना होगा जवाब

राहुल शर्मा की ओर से मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता पर सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के साथ कथित पक्षपात और जातीय भेदभाव के आरोप भी लगाए गए हैं।

UPPCL MEDIA स्पष्ट करता है कि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

लेकिन सरकारी विभाग में किसी अधिकारी के विरुद्ध जातीय आधार पर कार्रवाई होने का आरोप अपने आप में अत्यंत गंभीर है।

यदि आरोप गलत हैं तो जांच के माध्यम से उन्हें गलत साबित किया जाना चाहिए।

और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल राहुल शर्मा के निलंबन तक सीमित नहीं रहेगा।

सरकारी सेवा में अधिकारी की पहचान उसके काम, पद और जवाबदेही से होनी चाहिए—सरनेम या सामाजिक पहचान से नहीं।


‘बलि का बकरा’ कौन?

यही इस पूरे प्रकरण का सबसे तीखा सवाल है।

अगर जांच में यह सामने आता है कि 6000 KVA के मामले में अंतिम भार स्वीकृति का अधिकार अधीक्षण अभियंता स्तर पर था, तकनीकी अनुमोदन भी उच्च स्तर पर होना था और अधिशासी अभियंता ने फाइल आगे बढ़ाने तथा पत्राचार के माध्यम से अपनी भूमिका निभाई थी, तो फिर केवल अधिशासी अभियंता को निलंबित करना बलि का बकरा बनाए जाने की धारणा को जन्म देता है।

और यही धारणा विभाग को दूर करनी होगी।

बलि का बकरा किसी भी कीमत पर नहीं बनाया जाना चाहिए।

यदि राहुल शर्मा दोषी हैं तो कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन यदि उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर के निर्णयों और देरी का दोष भी उनके सिर मढ़ा गया है, तो यह उनके साथ अन्याय होगा।

जिम्मेदारी पद देखकर नहीं, अधिकार और वास्तविक भूमिका देखकर तय होनी चाहिए।


लेकिन राहुल शर्मा भी पूरी तरह सवालों से बाहर नहीं

यह भी साफ होना चाहिए कि केवल इसलिए कि अंतिम स्वीकृति किसी उच्च अधिकारी के पास थी, अधिशासी अभियंता स्वतः निर्दोष नहीं हो जाते।

यदि उनके स्तर पर कोई अनावश्यक क्वेरी की गई, आवेदन प्रक्रिया में वास्तविक देरी हुई, आवेदक को अनावश्यक परेशान किया गया या उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाली कोई प्रक्रिया जानबूझकर रोकी गई, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

UPPCL MEDIA किसी अधिकारी की तरफदारी नहीं करता।

हमारा सवाल सिर्फ इतना है—

जिस अधिकारी की जितनी जिम्मेदारी है, उस पर उतनी ही कार्रवाई हो। न कम, न ज्यादा।

यदि राहुल शर्मा की गलती है तो वह भी सामने आए।

लेकिन यदि उनके ऊपर ऐसी जिम्मेदारी डाली गई जो उनके अधिकार क्षेत्र में थी ही नहीं, तो फिर कार्रवाई करने वालों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।


विभागीय कार्रवाई या चुनिंदा जवाबदेही?

इस मामले में सबसे चिंताजनक बात यही है कि यदि एक ही फाइल में कई स्तर के अधिकारी शामिल थे, तो जिम्मेदारी तय करते समय सभी स्तरों की भूमिका सामने क्यों नहीं लाई गई?

क्या फाइल मूवमेंट की टाइमलाइन बनाई गई?

क्या प्रत्येक अधिकारी के पास फाइल रहने की अवधि निकाली गई?

क्या संबंधित कर्मचारियों के बयान लिए गए?

क्या निवेश मित्र पोर्टल का डिजिटल रिकॉर्ड देखा गया?

क्या तकनीकी विकल्पों की लागत का तुलनात्मक अध्ययन कराया गया?

क्या ठेकेदार की भूमिका की जांच हुई?

क्या अंतिम स्वीकृति के अधिकार वाले अधिकारी की भूमिका पर समान स्तर की जांच हुई?

यदि इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट में नहीं हैं, तो निलंबन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।


UPPCL MEDIA का मानना है कि

बिजली विभाग कोई निजी जागीर नहीं है।

कुर्सी किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी अधीनस्थ अधिकारी को अपनी सुविधा के अनुसार बलि का बकरा बनाया जा सकता है।

जिसके पास अधिकार है, उसके पास जवाबदेही भी होनी चाहिए।

यदि किसी अधिकारी के पास 6000 KVA जैसे बड़े संयोजन की अंतिम स्वीकृति का अधिकार था, तो उस स्तर की जिम्मेदारी को नजरअंदाज करके केवल नीचे के अधिकारी को निलंबित करना प्रशासनिक निष्पक्षता की कसौटी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

वहीं, यदि अधिशासी अभियंता ने अपने अधिकार क्षेत्र में लापरवाही की है तो उन्हें भी जवाब देना होगा।

लेकिन नियम यह नहीं कहता कि जिसकी गर्दन आसानी से पकड़ी जा सके, उसी को दोषी बना दो।

विभागीय अनुशासन का अर्थ “एक को पकड़ो और फाइल बंद करो” नहीं है।

अनुशासन का अर्थ है—जिसकी गलती, उसकी जिम्मेदारी।


अब जांच राहुल शर्मा की नहीं, पूरी फाइल की होनी चाहिए

इस मामले में स्वतंत्र जांच समिति गठित कर निम्न बिंदुओं की जांच आवश्यक है—

  • 6000 KVA संयोजन में अधिकार-क्षेत्र किस अधिकारी का था?

  • भार स्वीकृति की वास्तविक सक्षम प्राधिकारी कौन थी?

  • तकनीकी अनुमोदन किस स्तर पर लंबित रहा?

  • 9 जुलाई से 10 अगस्त तक फाइल किस-किस अधिकारी के पास रही?

  • निवेश मित्र पोर्टल पर आवेदन किस स्तर से रिजेक्ट हुआ?

  • पोर्टल लॉग में वास्तविक गतिविधि क्या दर्ज है?

  • संबंधित बाबू/पोर्टल ऑपरेटर की भूमिका क्या थी?

  • स्वतंत्र फीडर और मौजूदा बे के विकल्प में लागत का अंतर कितना था?

  • स्वतंत्र फीडर की तकनीकी आवश्यकता किस रिपोर्ट के आधार पर तय हुई?

  • संबंधित ठेकेदार की भूमिका क्या रही?

  • क्या किसी अधिकारी अथवा ठेकेदार को आर्थिक लाभ की संभावना थी?

  • राहुल शर्मा द्वारा किए गए पत्राचार को निलंबन की जांच में पूर्ण रूप से शामिल किया गया या नहीं?

  • मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता की भूमिका की भी समान स्तर पर जांच हुई या नहीं?


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राहुल शर्मा का निलंबन अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। इसी तरह उनके द्वारा लगाए गए आरोप भी स्वतः सत्य नहीं माने जा सकते।

लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों से जो सबसे बड़ा सवाल सामने आता है, वह है—

“यदि अधिकार क्षेत्र ऊपर था, तो जवाबदेही नीचे क्यों दिखाई दे रही है?”

यही सवाल इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच का आधार बनना चाहिए।

यदि राहुल शर्मा दोषी हैं तो विभाग उन्हें कठोर दंड दे।

यदि मुख्य अभियंता या अधीक्षण अभियंता स्तर पर भी लापरवाही, अनुचित दबाव, गलत निर्णय या अन्य अनियमितता सामने आती है तो उनके विरुद्ध भी कार्रवाई हो।

यदि ठेकेदार की भूमिका संदिग्ध है तो उसकी भी जांच हो।

और यदि जातीय भेदभाव के आरोप झूठे हैं तो उन्हें भी तथ्यात्मक जांच के जरिए खारिज किया जाए।

लेकिन कार्रवाई का तराजू एक तरफ झुका हुआ नहीं होना चाहिए।

किसी एक अधिकारी को निलंबित कर देना आसान है।

पूरी फाइल खोलकर असली जिम्मेदारी तय करना मुश्किल है।

और अब बुलंदशहर के इस 6000 KVA प्रकरण में असली परीक्षा इसी बात की है कि विभाग आसान रास्ता चुनता है या निष्पक्ष रास्ता।

UPPCL MEDIA का सीधा सवाल

“6000 KVA की स्वीकृति का अधिकार जिस स्तर पर था, उस स्तर की जवाबदेही कहां है?”

“क्या राहुल शर्मा को उनके अधिकार क्षेत्र की गलती के लिए निलंबित किया गया, या ऐसी जिम्मेदारी भी उनके सिर डाल दी गई जो उनके पद के अधिकार में थी ही नहीं?”

“क्या विभाग वास्तविक दोषी तक पहुंचेगा, या एक निलंबन के साथ फाइल बंद कर दी जाएगी?”

समय हर फाइल का हिसाब करता है।

और इस फाइल का हिसाब भी होना चाहिए—पूरी ईमानदारी से, पूरे अधिकार-क्षेत्र के साथ और बिना किसी अधिकारी को बलि का बकरा बनाए।

UPPCL MEDIA संबंधित सभी अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।

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खबर प्रकाशित

19 Aug, 10:42 am

6000 KVA संयोजन विवाद - क्या जिस अधिकारी के पास स्वीकृति का अधिकार था, उसकी जवाबदेही तय हुई? सिकंदराबाद म...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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