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करोड़ों का मेंटिनेंस, हजारों की मौतें! आखिर बिजली विभाग की जवाबदेही कब तय होगी?

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"मेंटिनेंस में करोड़ों, जमीन पर जीरो! UPPCL के हवा-हवाई दावे बेनकाब – 2030 का वायर फ्री सपना, 2026 में खुले ट्रांसफार्मरों से मौत का डर"

उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) हर साल बिजली व्यवस्था सुधारने, मेंटिनेंस, सुरक्षा और आधुनिक नेटवर्क के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का दावा करता है। लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों से बिल्कुल उलट दिखाई देती है। हर मानसून में बिजली व्यवस्था चरमराती है, खुले ट्रांसफार्मर जानलेवा बने रहते हैं, जर्जर खंभे हादसों को न्योता देते हैं और उपभोक्ता से लेकर कर्मचारी तक राहत के बजाय परेशानी झेलते हैं।

🔥 UPPCL MEDIA रिपोर्ट

लखनऊ/उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को देश की सबसे आधुनिक व्यवस्था बनाने के दावे हर साल किए जाते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, करोड़ों रुपये की योजनाओं का उद्घाटन होता है, मेंटिनेंस के नाम पर भारी बजट खर्च होता है और दावा किया जाता है कि अब उपभोक्ताओं को निर्बाध व सुरक्षित बिजली मिलेगी। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट दिखाई देती है।

हर मानसून में बिजली के पोल गिरते हैं, खुले ट्रांसफार्मर मौत बनकर खड़े रहते हैं, जर्जर तार लोगों की जान लेते हैं, हेल्पलाइन पर शिकायतें दम तोड़ती हैं और विभाग के कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं हैं। सवाल यह है कि जब हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं तो आखिर यह पैसा जा कहां रहा है?

मेंटिनेंस या सिर्फ कागजी खेल?

हर वर्ष गर्मी और मानसून से पहले विभाग करोड़ों रुपये खर्च कर यह दावा करता है कि—

  • ट्रांसफार्मरों के चारों ओर सुरक्षा जाली लगाई गई।
  • पेड़ों की छंटाई कराई गई।
  • स्टे वायर और इंसुलेटर बदले गए।
  • ढीले तार कस दिए गए।
  • विद्युत उपकरणों की मरम्मत कराई गई।

लेकिन हकीकत?

लेकिन पहली तेज बारिश आते ही...

⚠️ बिजली गुल...

⚠️ ट्रांसफार्मर फुंकने शुरू...

⚠️ पोल गिरने लगे...

⚠️ करंट फैलने लगा...

अगर मेंटिनेंस वास्तव में हुआ होता तो हर साल वही तस्वीर क्यों दोहराई जाती?

लखनऊ के बांग्ला बाजार, कैसरबाग, अमीनाबाद, चारबाग, सरोजनीनगर, चिनहट, महानगर सहित अनेक इलाकों में आज भी खुले ट्रांसफार्मर, जर्जर पोल और नीचे से गल चुके लोहे के खंभे दिखाई देते हैं। कई स्थानों पर इन्हीं कमजोर खंभों पर एबीसी लाइनें टिकी हुई हैं।

करोड़ों का बजट... लेकिन जनता अब भी खतरे में

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2026-27 में बिजली ढांचे को मजबूत करने के लिए लगभग 65,926 करोड़ रुपये का बजट दिया।

लखनऊ में

  • ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ाई गई।
  • नए पावर ट्रांसफार्मर लगाए गए।
  • आरडीएसएस योजना शुरू हुई।
  • अंडरग्राउंड केबलिंग का काम चल रहा है।

लेकिन बांग्ला बाजार, चारबाग, कैसरबाग, सरोजनीनगर, अमीनाबाद, चिनहट, महानगर... आज भी दर्जनों स्थानों पर खुले ट्रांसफार्मर और जर्जर पोल लोगों की जान लेने को तैयार खड़े हैं।

सवाल—यदि करोड़ों खर्च हो चुके हैं तो ये मौत के इंतजार में खड़े ट्रांसफार्मर किसकी जिम्मेदारी हैं?

2030 तक वायर फ्री सिटी का सपना... लेकिन आज भी खतरा बरकरार

आरडीएसएस योजना के तहत लखनऊ को 2030 तक वायर फ्री सिटी बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 5000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं।

चारबाग, राजाजीपुरम, अलीगंज, हजरतगंज और गोमतीनगर समेत कई इलाकों में अंडरग्राउंड केबलिंग का काम चल रहा है।

लेकिन दूसरी ओर कई क्षेत्रों में खुले ट्रांसफार्मर और जर्जर बिजली ढांचा विभाग के दावों की पोल खोल रहे हैं। इतना ही नहीं, अंडरग्राउंड केबलिंग के बाद फॉल्ट ढूंढना भी विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

मौतों का आंकड़ा विभाग के दावों की पोल खोल रहा है

अगर बिजली व्यवस्था सुरक्षित हुई होती तो मौतें कम होतीं, लेकिन सरकारी आंकड़े ही कहानी कुछ और बताते हैं।

वर्ष 2022-23

  • 3845 दुर्घटनाएं
  • 1428 मौतें

वर्ष 2023-24

  • 3640 दुर्घटनाएं
  • 1120 मौतें

वर्ष 2024-25

  • 3000 से ज्यादा हादसे
  • 1000 से ज्यादा मौतें

यानी...

हर दिन औसतन कई परिवार बिजली के करंट से उजड़ रहे हैं।

फिर भी विभाग कह रहा है— "सब ठीक है।"

हेल्पलाइन 1912—फोन लगाओ, इंतजार करो!

बिजली विभाग दावा करता है कि शिकायतों का समाधान तेजी से किया जाता है।

लेकिन आंकड़े बताते हैं—

अप्रैल से जुलाई तक 45 लाख 91 हजार से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें करीब 59 प्रतिशत शिकायतें ही समय सीमा के भीतर निपटीं। लगभग 41 प्रतिशत शिकायतें तय समय के बाद निस्तारित हुईं। हजारों शिकायतें अभी भी लंबित हैं।

यानी...

हेल्पलाइन है... लेकिन राहत की गारंटी नहीं।

कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं

सिर्फ उपभोक्ता ही नहीं... विभाग के कर्मचारी भी असुरक्षित हैं। कई कर्मचारी बताते हैं कि 11000 वोल्ट लाइन पर काम करते समय करंट लगने से किसी का हाथ कट गया...

  • किसी का पेट पूरी तरह जल गया...
  • किसी की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई...

लेकिन

मुआवजे के लिए आज भी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

वर्टिकल व्यवस्था ने बिगाड़ा पूरा सिस्टम?

बिजली कर्मचारियों और उपभोक्ता संगठनों का आरोप है कि वर्टिकल व्यवस्था लागू होने के बाद

  • अनुभवी कर्मचारियों की संख्या कम हुई।
  • एक कर्मचारी से तीन लोगों का काम लिया जा रहा है।
  • कर्मचारियों की संख्या घटा दी गई।
  • फील्ड में निगरानी कमजोर हुई।
  • मेंटिनेंस प्रभावित हुआ।
  • और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा।
  • स्थानीय तकनीकी अनुभव रखने वाले अधिकारी और कर्मचारी व्यवस्था से बाहर हो गए।

यदि ऐसा नहीं है...

तो फिर लगातार हादसे क्यों हो रहे हैं?

लाइन लॉस के आंकड़ों पर भी सवाल

जानकारों का कहना है कि वर्टिकल व्यवस्था लागू होने से पहले कई क्षेत्रों में लाइन लॉस 10 प्रतिशत से नीचे पहुंच चुका था।

अब आरोप है कि वास्तविक लाइन लॉस 40 प्रतिशत से अधिक है, लेकिन विभाग कम आंकड़े दिखा रहा है। यदि फीडरवार ऑडिट कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

कर्मचारियों की दर्दनाक कहानी

राम सुमेर (बिजली कर्मचारी)

11 हजार वोल्ट लाइन पर कार्य करते समय करंट लगने से गंभीर रूप से घायल हुए।

  • पेट की आंतें क्षतिग्रस्त।
  • लाखों रुपये इलाज में खर्च।
  • आज तक विभाग से मुआवजा नहीं।

उनका आरोप है—

"सीएमओ से कागज लाओ, फिर मुआवजा मिलेगा... लेकिन कोई सुनने वाला नहीं।"

बलदेव (अलीगढ़)

11 हजार वोल्ट लाइन पर कार्य के दौरान करंट लगने से हाथ काटना पड़ा।

  • नौकरी चली गई।
  • मुआवजा नहीं मिला।
  • परिवार आर्थिक संकट में।

हर साल सैकड़ों मौतें... फिर भी कोई सबक नहीं?

उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि बिजली सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो चुकी है। हर साल 1100 से 1200 लोग करंट से जान गंवा रहे हैं। मेंटिनेंस पर खर्च बढ़ रहा है लेकिन हादसे कम नहीं हो रहे।

उनका दावा है—

  • हर वर्ष 1100 से 1200 लोगों की बिजली हादसों में मौत होती है।
  • पशुओं की भी बड़ी संख्या में जान जाती है।
  • करोड़ों रुपये के मेंटिनेंस खर्च के बावजूद दुर्घटनाएं कम नहीं हो रहीं।
  • पूरी व्यवस्था में सुरक्षा से ज्यादा "कमीशन" का खेल दिखाई देता है।

🟥 विभाग का पक्ष

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड का कहना है—

  • ✔ मेंटिनेंस लगातार चल रहा है।
  • ✔ ट्रांसफार्मरों की सुरक्षा जालियां बदली जा रही हैं।
  • ✔ एबीसी लाइन और अंडरग्राउंड केबल से खतरा कम हुआ है।
  • ✔ आरडीएसएस योजना के तहत तेजी से काम हो रहा है।
  • ✔ भविष्य में पूरा शहर अंडरग्राउंड नेटवर्क से जुड़ जाएगा।

🔥 UPPCL MEDIA का अहम सवाल

जब हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं...

जब मेंटिनेंस के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं...

जब 2030 तक वायर फ्री सिटी का सपना दिखाया जा रहा है...

तो फिर—

  • 👉 हर साल हजारों बिजली हादसे क्यों?
  • 👉 करंट से हजारों मौतें क्यों?
  • 👉 खुले ट्रांसफार्मर अब भी क्यों?
  • 👉 हेल्पलाइन पर शिकायतों का अंबार क्यों?
  • 👉 घायल कर्मचारियों को समय पर मुआवजा क्यों नहीं?
  • 👉 जनता और कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी?

🔥 अगर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी हर बारिश में बिजली व्यवस्था घुटनों पर आ जाए, हर साल हजारों लोग करंट से जान गंवा दें, हेल्पलाइन समय पर मदद न दे और खुले ट्रांसफार्मर मौत का इंतजार करते रहें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि व्यवस्था में सुधार ज्यादा हुआ है या सिर्फ दावों और फाइलों में आंकड़ों का खेल?

नोट: इस रिपोर्ट में विभाग के दावों के साथ-साथ उपलब्ध आंकड़ों, प्रभावित पक्षों के आरोपों और विभागीय पक्ष—दोनों को शामिल किया गया है। जहां आरोप या दावे हैं, उन्हें उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है।

खबर से आगे, जवाब तक

यदि कोई खबर शिकायत से संबंधित है तो, अभी तक का अपडेट

खबर प्रकाशित

6 Aug, 05:58 am

"मेंटिनेंस में करोड़ों, जमीन पर जीरो! UPPCL के हवा-हवाई दावे बेनकाब – 2030 का वायर फ्री सपना, 2026 में खुले ट्...

आगे की रिपोर्ट आने पर यहीं जुड़ेगी। अभी समाधान की पुष्टि नहीं हुई है।

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